aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँगमैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयाततेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या हैतेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबाततेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या हैतू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाएयूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाएऔर भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवाराहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने मेंज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना होउसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंमदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना होबहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंबदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना होकिसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंकिसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना होहक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना होहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
मैं इश्क़ का असीर थावो इश्क़ को क़फ़स कहेकि उम्र भर के साथ कोवो बद-तर-अज़-हवस कहे
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनोंन मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी कीन तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों सेन मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों सेन ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीजब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे सेसब बुत उठवाए जाएँगेहम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएँगेसब ताज उछाले जाएँगेसब तख़्त गिराए जाएँगेबस नाम रहेगा अल्लाह काजो ग़ाएब भी है हाज़िर भीजो मंज़र भी है नाज़िर भीउट्ठेगा अनल-हक़ का नाराजो मैं भी हूँ और तुम भी हो
मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ाखो चुका है जो किसी और की रानाई मेंशायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल मेंऔर कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता हैकि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव मेंगुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थीये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर हैतिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थीअजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो करतिरे जमाल की रानाइयों में खो रहतातिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखेंइन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहतापुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने कीतिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेताहयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैंघनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेतामगर ये हो न सका और अब ये आलम हैकि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहींगुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसेइसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहींज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गलेगुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों सेमुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैंहयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों सेन कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरीइन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो करमैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँहीकभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
दीप जिस का महल्लात ही में जलेचंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चलेवो जो साए में हर मस्लहत के पलेऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर कोमैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
तुम्हें इक बात कहनी थीइजाज़त हो तो कह दूँ मैं
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी हैपल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी हैमुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गएकुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गएवो भी इक पल का क़िस्सा थे मैं भी इक पल का क़िस्सा हूँकल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँपल दो पल में कुछ कह पाया इतनी ही स'आदत काफ़ी हैपल दो पल तुम ने मुझ को सुना इतनी ही ‘इनायत काफ़ी हैकल और आएँगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वालेमुझ से बेहतर कहने वाले तुम से बेहतर सुनने वालेहर नस्ल इक फ़स्ल है धरती की आज उगती है कल कटती हैजीवन वो महँगी मदिरा है जो क़तरा क़तरा बटती हैसागर से उभरी लहर हूँ मैं सागर में फिर खो जाऊँगामिट्टी की रूह का सपना हूँ मिट्टी में फिर सो जाऊँगाकल कोई मुझ को याद करे क्यूँ कोई मुझ को याद करेमसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँचली है रस्म कि कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकलेनज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चलेहै अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशादकि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँजगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगामैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू मेंरोज़ की तरह से वो आज भी आया होगाऔर जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हेंऔर ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हेंजैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थींजैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँशायद जान-ए-जाँ शायद
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरासो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरामिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल हैमिरे घर का वही सरनाम-तर है जो भी बिस्मिल हैगुज़श्त-ए-वक़्त से पैमान है अपना अजब सा कुछसो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ
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