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नज़्म
कुछ मुँह से निकल जाएँ न समझी हुई बातें
रहने दो मुझे मजलिस-ए-मय में यूँही मदहोश
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
ये सराबों के पुजारी ये ग़ुलामों के ग़ुलाम
मज्लिस-ए-जौर-ओ-जफ़ा कारगह-ए-दाना-ओ-दाम
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
बुलंद दा'वा-ए-जम्हूरियत के पर्दे में
फ़रोग़-ए-मजलिस-ओ-ज़िन्दाँ हैं ताज़ियाने हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिस
गिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा
जौन एलिया
नज़्म
मजलिस-ए-वाज़ आज तो होती नज़र आती नहीं
हज़रत-ए-वाइ'ज़ अबस कोशाँ हैं कोरम के लिए
नवाब सय्यद हकीम अहमद नक़्बी बदायूनी
नज़्म
मज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार हो
है वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़र
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मज्लिस-ए-‘इश्क़ में पाता हूँ इसे मैं मदहोश
महफ़िल-ए-'अक़्ल में देखा तो ये हुशियार भी है
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
सर ले के हथेली पर उभरी थी जो दुनिया में
उस क़ौम को ले डूबा शुग़्ल-ए-मै-ओ-मय-ख़ाना
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
निगाह-ए-मस्त से उस की बहक जाती थी कुल वादी
हवाएँ पर-फ़िशाँ रूह-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
''या हाथों-हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय''
''या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ''