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नज़्म
जो तुम चाहो तो इस की धूम इक आलम में मच जाए
यही हैं वो कि जो रूठे हुओं को हैं मना सकते
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
सरसब्ज़ हो गया है वीरान सारा जंगल
जंगल में मच गया है हर-सू ख़ुशी का मंगल
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
नज़्म
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल