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नज़्म
रस्ते में शहर की रौनक़ है इक ताँगा है दो कारें हैं
बच्चे मकतब को जाते हैं और तांगों की क्या बात कहूँ
मीराजी
नज़्म
शैख़-ए-मकतब के तरीक़ों से कुशाद दिल कहाँ
किस तरह किबरीत से रौशन हो बिजली का चराग़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
ता'लीम न होगी जिस में कभी सब आज़ादी से घूमेंगे
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
रंग-ए-दुनिया भी मिला... रंग-ए-तमन्ना भी लगा कर देखा
मकतब-ए-इश्क़ में जितने भी सबक़ याद किए