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नज़्म
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनिया
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम
मोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
कुछ और मिरे ख़्वाब हैं कुछ और मिरा दौर
ख़्वाबों के नए दौर में ने मोर ओ मलख़ ने असद ओ सौर
नून मीम राशिद
नज़्म
हमारी ख़ल्वत-ए-मासूम रश्क-ए-तूर होती थी
मलक झूला झुलाते थे ग़ज़ल-ख़्वाँ हूर होती थी
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
और चले हैं पूरे मलक की फ़िक्र करने
बल्कि सारी इंसानियत का ग़म पाल रखा है आप ने तो