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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कुछ और मिरे ख़्वाब हैं कुछ और मिरा दौर
ख़्वाबों के नए दौर में ने मोर ओ मलख़ ने असद ओ सौर
नून मीम राशिद
नज़्म
अपना हक़ माँग मगर उन के तआ'वुन से न माँग
जो तिरे हक़ का तसव्वुर ही फ़ना कर डालें