aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "malba"
मेरे शहर के सारे रस्ते बंद हैं लोगोमैं इस शहर का नग़्मा-गरजो दो इक मौसम ग़ुर्बत के दुख झेल के आयाताकि अपने घर की दीवारों सेअपनी थकी हुई और तरसी हुईआँखें सहलाऊँअपने दरवाज़े के उतरते रोग़न कोअपने अश्कों से सैक़ल कर लूँअपने चमन के जले हुए पौदोंऔर गर्द-आलूद दरख़्तों कीमुर्दा शाख़ों पर बैन करूँहर महजूर सुतून को इतना टूट के चूमूँमेरे लबों के ख़ून सेउन के नक़्श-ओ-निगार सभी जी उठेंगली के लोगों को इतना देखूँइतना देखूँमेरी आँखेंबरसों की तरसी हुई आँखेंचेहरों के आँगन बन जाएँफिर मैं अपना साज़ उठाऊँआँसुओं और मुस्कानों से झिलमिल झिलमिलनज़्में ग़ज़लें गीत सुनाऊँअपने प्यारोंदर्द के मारों का दरमाँ बन जाऊँलेकिन मेरे शहर के सारे रस्तों परअब बाड़ है लोहे के काँटों कीशह दरवाज़े पर कुछ पहरे-दार खड़े हैंजो मुझ से और मुझ जैसे दिल वालों कीपहचान से आरीमेरे साज़ सेसंगीनों से बात करेंमैं उन से कहता हूँदेखोमैं इस शहर का नग़्मा-गर हूँबरसों बा'द कड़ी राहों कीसारी अज़िय्यत झेल के अब वापस आया हूँउस मिट्टी की ख़ातिरजिस की ख़ुशबुएँदुनिया भर की दो-शीज़ाओं के जिस्मों की महकों सेऔर सारे जहाँ केसभी गुलाबों सेबढ़ कर हैमुझ को शहर मेंमेरे शहर में जाने दोलेकिन तने हुए नेज़ों नेमेरे जिस्म को यूँ बर्मायामेरे साज़ को यूँ रेज़ायामेरा हुमकता ख़ून और मेरे सिसकते नग़्मेशह-दरवाज़े की दहलीज़ सेरिसते रिसतेशहर के अंदर जा पहुँचे हैंऔर मैं अपने जिस्म का मलबासाज़ का लाशाअपने शहर के शह-दरवाज़ेकी दहलीज़ पे छोड़ केफिर अनजाने शहरों की शहराहों परमजबूर-ए-सफ़र हूँजिन को तज कर घर आया थाजिन को तज कर घर आया था
मेरे पास रातों की तारीकी मेंखिलने वाले फूल हैंऔर बे-ख़्वाबीदिनों की मुरझाई हुई रौशनी हैऔर बीनाईमेरे पास लौट जाने को एक माज़ी हैऔर याद...मेरे पास मसरूफ़ियत की तमाम तर रंगा-रंगी हैऔर बे-मानवीयतऔर इन सब से परे खुलने वाली आँखमैं आसमाँ को ओढ़ कर चलताऔर ज़मीन को बिछौना करता हूँजहाँ मैं हूँवहाँ अबदियत अपनी गिर्हें खोलती हैजंगल झूमते हैंबादल बरसते हैंमोर नाचते हैंमेरे सीने में एक समुंदर ने पनाह ले रक्खी हैमैं अपनी आग में जलताअपनी बारिशों में नहाता हूँमेरी आवाज़ मेंबहुत सी आवाज़ों ने घर कर रक्खा हैऔर मेरा लिबासबहुत सी धज्जियों को जोड़ कर तय्यार किया गया हैमेरी आँखों मेंएक गिरते हुए शहर का सारा मलबा हैऔर एक मुस्तक़िल इंतिज़ारऔर आँसूऔर इन आँसुओं से फूल खिलते हैंतालाब बनते हैंजिन में परिंदे नहाते हैंहँसते और ख़्वाब देखते हैंमेरे पासदुनिया को सुनाने के लिए कुछ गीत हैंऔर बताने के लिए कुछ बातेंमैं रद किए जाने की लज़्ज़त से आश्ना हूँऔर पज़ीराई की दिल-नशीं मुस्कुराहट सेभरा रहता हूँमेरे पासएक आशिक़ की वारफ़्तगीदर-गुज़र और बे-नियाज़ी हैतुम्हारी इस दुनिया मेंमेरे पास क्या कुछ नहीं हैवक़्त और तुम पर इख़्तियार के सिवा?
ख़ुनुक हवा का बरहना हाथों से ज़र्द माथे सेपहला पहला मुकालिमा हैअभी ये दिन-रात सर्द-मेहरी के इतने ख़ूगर नहीं हुए हैंतो फिर ये बे-वज़्न सुब्ह क्यूँ बोझ बन रही हैसवाद-ए-आग़ाज़-ए-ख़ुश्क-साली में क्यूँ वरक़ भीगने लगा हैधुआँ धुआँ शाम के अलाव में कोई जंगल जलेकि रूठी हुई तमन्नाख़िज़ाँ का पानी कोई इशारा नहीं समझताये नहर अब तक पुराने पहरे में चल रही हैअजीब तासीर आख़िर-ए-शब के आसमाँ कीहवा चले या ज़मीन घूमेफ़सील कोहरे की कोई सूरज नहीं गिराताज़मीन से मलबा गए दिनों का कोई सितारा नहीं उठाता
ज़ईफ़ी की शिकन-आलूद चादर से बदन ढाँपेवो अपनी नौजवाँ पोती के साथआहिस्ता आहिस्तासड़क के एक जानिब चल रहा थागुमाँ होता थाजैसे धूप के काँधे पेछाँव हाथ रक्खे चल रही हैचीख़ती एड़ियों पर कड़कड़ाती हड्डियाँ गाड़े हुएवो जिस्म का मलबा उठाए जा रहा थाअगरचे पाँव जुम्बिश कर रहे थेमगर बूढ़ी कमर इतनी ख़मीदा थीकि टाँगें झूलती बैसाखियाँ मालूम होती थीं
मैं शहर-ए-तमन्ना की ताराज नगरी के मलबे मेंलाचार-ओ-तन्हाकभी इस खंडर पर कभी उस खंडर तकभटकता हुआढूँडता फिर रहा हूँअपने मासूम मिस्मार ख़्वाबों का मलबातभी इक तरफ़ को नज़र जो गई तो दिखाई दियाटूटे फूटे जलाए गए कुछ मकाँएक मीनार-ए-मस्जिदकलश एक मंदिर का औंधा पड़ा हैकुरेदा तो मलबे के नीचे मेरा ख़्वाबसाँझी विरासत का एक साज़ भी दफ़्न थामुझे याद आयामेरे अम्माँ अब्बा ने इस साज़ परकितने उल्फ़त के नग़्मे बजा कर सिखाए थे हम कोजवानी मेंइस साज़ की नर्म दिलकश धुनों परबड़े जोश और हौसले सेतराने मोहब्बत के गाय थे हम नेमगर फिररूह-परवर अज़ानों की आवाज़और मंदिरों के भजनदिलकशी भूल करअपने ग़लबे का एलान बनते गएशोर इतना बढ़ासाज़-ए-उल्फ़त की आवाज़ भी दब गईशोर से जोश बढ़ता गयाहोश जाता रहाऔर फिर ये हुआआज शहर-ए-तमन्ना की हालत है जोजिस तरफ़ देखिए राख ही राख हैऔर मैंअपनी मीरास कोअपनी साँझी विरासत के टूटे हुए साज़ कोअपने दिल से लगाएदिल-शिकस्ता-ओ-गिर्यां खड़ा हूँक्या करूँइस को मलबे में ही दफ़्न कर दूँमुझ से ये तो नहीं होगाऐसा करता हूँ टूटे हुए साज़ कोअपनी औलाद को सौंप दूँबस इसी आस परइसी उम्मीद मेंमेरे बच्चे फिर उस साज़ को जोड़ करगीत उल्फ़त के फिर गुनगुनाने लगेंनफ़रतों को मिटाने लगेंकाश ये हो सके
मैं ख़ुदा की क़ब्र हूँख़ुदा मेरे अंदर दफ़्न हैभई, मैं ने अपने हाथों से दफ़्न किया है उसे!फ़र्क़ ये है कि दफ़्न होने के बावजूद ज़िंदा है वोज़िंदा दर-गोरऊपर से मलबा हटाने की देर हैअंदर से ख़ुदा निकल आएगाहाँ हाँ मेरे अंदर से निकल आएगाये जो मनों मिट्टी डाल रक्खी है मैं ने उस परअक़ीदों और नज़रयों कीख़यालों और वाहिमों कीख़्वाहिशों और लग़वियात कीअगर किसी रोज़ किसी तूफ़ान बारिश में बह गईतो देखना इसी मेरे टूटे-फूटे बदन की उजाड़ क़ब्र सेजीता-जागता तर-ओ-ताज़ा ख़ुदा कैसे नुमूदार हो जाएगाजैसे सर-ब-फ़लक पहाड़ियों की यख़-बस्ता वादियों मेंबर्फ़ पिघलने के बाददेखते ही देखतेता-हद्द-ए-नज़रफूल खिल उठते हैं
ये छोटी छोटी सी ख़्वाहिशें थींकिसी बड़े शहर की कई मंज़िला इमारत से गिर पड़ीं हैंफिर उन का मलबा समेट कर हमबतौर ईंधन नजिस मशीनों में झोक आए
ग़लत लोगों की बारिश हो रही हैपानी की बजाए उन की नहूसत बरस रही हैएक कुत्ता रात और दिन के दरमियान खड़ा रो रहा हैग़लत बारिश नहूसत और कुत्ते की आवाज़ सेज़िंदगी के किसी भी फ़र्श पर सुलाने वाली नींद लाज़िम हैमगर नींद को तो आदमी की आँखों के ऊपर से उठा लिया गया हैया'नी अब क़यामत तक सिर्फ़ जागना हैऔर उस के सिवा मैदान-ए-हश्र हो भी क्या सकता हैकोई नहीं जानता कि जानने से पहले किस ने कितना जानाकिस ने अज़ल और अबद के तूल-ओ-अर्ज़ को जानाया जाने बग़ैर ही ग़लत ज़मीन की ग़लत दुनिया में ग़लत ज़िंदगी गुज़री गईतो क्या वो मौत थी जो किसी को ज़िंदगी से ले जाने के लिए आई या नहीं आईमगर ये जो सारे मंज़र किसी नहूसत ने दिखाएवो किस नाम की बुनियाद से शुरूअ' हुईया शुरूअ' न हो के किस नाम पर ख़त्म हुईख़त्म हुई भी या नहींझूट ने सच से क्या कहाया सच ने झूट से क्या कहाहमारे होते हुए जो बिसात-ए-ज़िंदगी उठा दी गईवो अब कौन बिछाएहवा ने कभी कोई दिया रौशन नहीं कियाहमारे होते हुए जो बिसात-ए-ज़िंदगी उठा दी गईवो अब कौन बिछाएहवा ने कभी कोई दिया रौशन नहीं कियातो जब हम नहीं होंगेफिर हमारे बनाए होए रास्ता पर कौन चलेगामोहब्बत नाम देती है नाम मिटाती नहींतो अब मोहब्बत को मोहब्बत से ख़तरा लाहक़ हैवहशत से कहो कि वो ज़रा खिड़की खोल कर देखेकहीं दुनिया बोलियों और ज़बानों का मलबा हो चुकी हो और हमें पता न चला होकहीं मलबे से ढूँढ ढूँढ के तरह तरह के बाज़ार निकाले और लगाए जा रहे हूँऔर हमें पता न चला होज़रा एडीसन की रूह से पूछोउस के बल्ब ख़्वाब-गाह और मुर्दा-ख़ाने में ब-यक-वक़्त क्यूँ रौशन होते हैंमोहब्बत जब आवाज़ बनीतो आवाज़ से बोलियाँ और ज़बानें कब बनींक्या ज़मीन पर कोई जंगज़मीन के बाहर लड़ी गईअगर नहीं तो क्या ज़मीन पर सातों आसमान नाज़िल हुएअगर नहीं तो ज़मीन पर ज़मीन नाज़िल हुई
कहो कौन हो तुमअज़ल से खड़े होनिगाहों में हैरत के ख़ेमे लगाएउफ़ुक़ के घने पानियों की तरफ़अपना चेहरा उठाएकहो कौन हो तुम बताओ बताओकहीं तुम तिलिस्म-ए-समाअत से ना-आश्ना तो नहीं होकहीं तुम वो दर तो नहीं होजो सदियों की दस्तक से खुलता नहींया क़दीमी शिकस्ता सी मेहराब होजिस में कोई चराग़-ए-रिफ़ाक़त भी जलता नहींधुँद-आलूद कोहना पहाड़ों मेंअंदर ही अंदर को जाता हुआ रास्ता तो नहीं होवही रंग होजिस से रंग और आमेज़ होता नहींबे-नुमू झील जिस में परिंदा कोईअपने पर तक भिगोता नहींकौन हो तुम बताओ बताओकहीं मलबा-ए-वक़्त परनीस्ती के अंधेरे में बैठे हुएरोज़-ए-अव्वल से उजड़े हुएबे-सहारा मकीं तो नहीं होकहीं तुम फ़लक से परेया वरा-ए-ज़मीं तो नहीं हो!
गुम्बदों को धूप की लम्बी ज़बानें खा गई हैंसहन में ज़ंजीर से जकड़े हुए ख़ारिश-ज़दाबीमार कुत्तेभौंकते हैंऔर छप्पर उड़ रहे हैंसर्द-आवर तारीक कमरों में बिछे क़ालीनमलबा सूँघते हैंऊन और रेशम के रंगीं फूलमुरझाने लगे हैंऔर अब ख़ूँ भी नहीं हैजिस से सींचा जाए उन कोइक कबूतर इस हवेली से खुली नीली फ़ज़ा मेंउड़ गया हैऔर कुत्ते भौंकते हैं
मुझे तकमील की सरहद पे ला के राएगानी की बशारत दी गई हैमैं जो रेज़ा रेज़ा मलबा बनती आबादी का नौहा-ख़्वाँ हूँमेरे हाथ की ख़्वाहिशक़लम से, फूल की पत्ती बनाना चाहती है...मगर मैं मलबे की ईंटों की गिनती कर रहा हूँघर के वीराने में बैठायाद आने वाले लम्हों कोभुलाने के लिए दोहरा रहा हूँ
आँखें अंधे कुएँ की मानिंद दूर अँधेरे रस्तों पर पानी को खुरच रहें हैंगहरी धुँद की चादर ओढ़े कौन अभागनफूट फूट के रो भी न पाईसब्र की रोटी चुप का सालन सब ज़ाइक़ों से कड़वा ज़हर गले के अंदरकुंद छुरी की मानिंद अटकेक्या बोले सारे लफ़्ज़ अपने लहू की गर्दिश से बे-परवाहलब पर उतरेंमुआ'फ़ी के छिलकों को उतारुंगी रूहें कुछ न कहेंगीदेना सब कुछ इस कोवापस कुछ भी न लेनाहाथ तुम्हारे सदा ही भर रहेंगे जज़्बों केफूलों सेमत कुछ कहना वर्ना सारा मलबा तुम्हारे ऊपर आन गिरेगाकच्ची दीवारों के नाते तस्वीरों के रंगों से भी कच्चेहाथों वार ज़बानों पर गुज़री बातों के सारे सुख इक इक कर के मिटते जाते हैंमन की सारी शक्ति बीच समुंदर डूब गई हैहवा में आँसू गैस के गोले छूटें तो सब रोना एक ही वक़्त में रोलेंत्याग का लम्बा रस्ता बा नहीं फैलाए अपनी ओर बुलाता हैआगे जाओ सब कुछ सुनोआओ इस आवाज़ के रस्ते पर चलते जाएँदीवार दूर से दूर
फ़ज़ाएँ थक चुकी हैंजिस्म ढोती गाड़ियों की सिसकियाँऔर सायरन के बैन सुन सुन केदर-ओ-दीवार के नथुने झुलसने लग गए बारूद की बू सेबदन के चीथड़े चुन चुन के अब बेज़ार हैं गलियाँवो मलबाआग का चाटा हुआ मलबाइकट्ठा करते करते ख़ाक-दाँ तंग आ चुके हैंमगर इंसान उकताता नहीं है
आँखें अंधे कुएँ की मानिंद दूर अंधेरे रस्तों पर पानी को खुरच रही हैंगहरी धुंद की चादर ओढ़े कौन अभागनफूट फूट के रो भी न पाईसब्र की रोटी चुप का सालन सब ज़ाइक़ों से कड़वा ज़हर गले के अंदरकुंद छुरी की मानिंद अटकेक्या बोले सारे लफ़्ज़ अपने लहू की गर्दिश से बे-परवालब पर उतरेंमआ'नी के छिलकों को उतारूँ नंगी रूहें कुछ न कहेंगीदुनिया सब कुछ उस कोवापस कुछ भी न लेना हाथ तुम्हारे सदा ही भरे रहेंगे जज़्बों के फूलों सेमत कुछ कहना वर्ना सारा मलबा तुम्हारे ऊपर आन गिरेगाकच्ची दीवारों के नाते तस्वीरों के रंगों से भी कच्चेहाथों और ज़बानों पर गुज़री बातों के सारे सुख इक इक कर के मिटते जाते हैंमन की सारी शक्ति बीच समुंदर डूब गई हैहवा में आँसू-गैस के गोले छूटें तो सब रोना एक ही वक़्त रो लेंत्याग का लम्बा रस्ता बाँहें फैलाए अपनी ओर बुलाता हैआगे जाओ सब कुछ सुनोआओ इस आवाज़ के रस्ते पर चलते जाएँदीवार दूर से दूर
ये इक लम्हाबहुत संजीदगी से सोचने का हैकि इस के बा'दअब जो मरहला होगाकिसी सिम-सिम के खुलने कान शाहों के दफ़ीने हाथ आने कान जश्न-ओ-रक़्स का होगाभयानक रूह-फ़र्सा मरहला वोयक़ीननअश्क-ओ-ख़ाक-ओ-ख़ूँ नहाए शहर सेमलबा हटानेऔर तअ'फ़्फ़ुन से भरेताबूत ही ढोने का होगा
उफ़ुक़ वाले तह-ख़ाने सेवो बरामद हुआ दिनजो क़रनों पे भारी हैआँखों के आगेअंधेरे का मलबा गिराता हैचौ-तरफ़ घेरा बनाता हैहैबत बढ़ाता हैमुख़्बिरबड़े आतिशी शीशे सेरास्तों का घना जाल तकता हैबाहरतग़ारे के नीचे क़दम के निशाँ को छुपाया हुआ हैलहद की ज़रा सी जगह कोफ़लक-ज़ार गुम्बद बनाया हुआ हैघरों की छतें उड़ने बिजली कड़कनेम'अन क़ुर्स-ए-ख़ुर्शीद छुपनेसफ़ेदी भरे आसमानी किनारे के तारीक होने का दिन आ गया हैशरारत से सरशारबहनों के ख़ामोश होने काऔर माँ के ख़ामोश होने का दिन आ गया हैमिरी माँमिरी अन-कही बातें ऐसे समझती थीदाऊद जैसे परिंदों की बातें समझता थामाँ की मोहब्बत भरी गोद आटे का पेङ़ा थीजब मैं हुमकतातो माँ की मोहब्बत भरी गोद ऐसे पिघलती थीदाऊद के हाथ में जैसे लोहा पिघलता थामैं टूटता तोहरारत भरी गोद मेंऐसे जुड़ता थासारा के ख़ाविंद की आवाज़ परजिस तरह मुर्ग़ जुड़ता थाऔर दिल तशक्कुर से भरता थासारा के ख़ाविंद का दिलउन पहाड़ों के पीछेकहीं पर सफ़ा और मर्वा नहीं थीजहाँ माँ मिरी दौड़ सकतीफटे नाख़ुनों और रा'शा-ज़दा जिस्म सेवो मोहब्बत भरे गर्म पानी चमकते हुए आँसुओं जैसे पानी की ख़्वाहिश मेंकैसे कुआँ खोद सकतीजहाँ पर न पानी की रौशन जबीं थीन पानी थामैं ने कहा था कि माँमेरे लोहे की सूरत पिघलने मिरे मुर्ग़ की तरहटुकड़ों में तक़्सीम होने का दिन आ गया हैज़मानों तलकतेरे रोने काबहनों के ख़ामोश होने काऔर मेरे रू-पोश होने का दिन आ गया है
उस के नामजिस ने दुनियाओं में ख़ैर-ओ-शर में तवाज़ुन रखाताकि अहल-ए-जुनूँ कार-ज़ार-ए-जहाँ में मोहब्बत का प्रचार करते रहेंमुश्किलें और आसाइशें वक़्त की डोर में यूँ पिरो दी गईं कि ख़बीस और तय्यब इकट्ठे न होंताकि बहता लहू पानियों में भी पहचान क़ाएम रखेताकि दीवार का नाम मलबा न होताकि नेज़ों पे रक्खे हुओं और सज्दों में रगड़े हुओं के अलग सिलसिले हों अलग शहर होंताकि ख़ुशबू को ख़ुशबू कहा जाए और उस के फैलाव और रास्तों का त'अय्युन हो ता'लीम होरौशनी एक तहज़ीब हो तीरगी एक तहज़ीब हो
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
अदाएँ ले के आई है वो फ़ितरत के ख़ज़ानों सेजगा सकती है महफ़िल को नज़र के ताज़्यानों सेवो मलका है ख़िराज उस ने लिए हैं बोस्तानों सेबस इक मैं ने ही अक्सर की हैं ना-फ़रमानियाँ उस की
और अब संग-ओ-गिल-ओ-ख़िश्त के मलबे के तलेउसी दीवार का पिंदार है रेज़ा रेज़ाधूप निकली है मगर जाने कहाँ है साया
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