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नज़्म
रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
धनक-भर मुआवज़ा तो नहीं
माहेरीन गिरानी और गुनाह में तनासुब-ए-माकूस नहीं मानते
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
वो रूठे मनते जाते हैं जिन्हें मनना न आता था
वो बिगड़े बन गए आख़िर जिन्हें बनना न आता था