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नज़्म
रह-गुज़र, साए, शजर, मंज़िल-ओ-दर, हल्का-ए-बाम
बाम पर सीना-ए-महताब खुला, आहिस्ता
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
परे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ की
सितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
ज़र दाम-दिरम का भांडा है बंदूक़ सिपर और खांडा है