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नज़्म
ज़ेब-ए-दीवाँ ही नहीं हर-क़ाश-ए-दिल पर नक़्श है
हर्फ़-ए-क़ौल-ए-'आरज़ू' लफ़्ज़-ए-मक़ाल-ए-'आरज़ू'
मासूम शर्क़ी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
शुमाल-ए-जावेदाँ अपना शुमाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
है अब भी अपनी पूँजी इक मलाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
जौन एलिया
नज़्म
उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीम
उस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैं
कैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस्लाम के इस बुत-ख़ाने में असनाम भी हैं और आज़र भी
तहज़ीब के इस मय-ख़ाने में शमशीर भी है और साग़र भी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसी
लाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाए