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नज़्म
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
मिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरो
जौन एलिया
नज़्म
बन नहीं पड़ता मुझे इन के सवालों का जवाब
क्या करूँ मैं कि ख़ुशी का नहीं मक़्दूर मुझे
महशर बदायुनी
नज़्म
गुनाहों का क्या मक़्दूर था अच्छा अमल भी हो नहीं पाया
किसी बुढ़िया की कुटिया में दिया झाड़ू
मोहम्मद इज़हारुल हक़
नज़्म
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम