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नज़्म
कोई अपना हो पराया हो गले सब से मिले
मेल हो सब से यही तो मक़्सद-ए-इस्लाम है
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
मक़्सद-ए-ज़ीस्त मगर जा के कहीं डूब गया क्या लहू एक नहीं
अपने ही ख़ून की बरखा में नहाए है समाज
बेकल उत्साही
नज़्म
इस से होता है कमाल-ए-शाइ'री का इंकिशाफ़
इतने पेचीदा मतालिब और फिर भी इतने साफ़
जगत मोहन लाल रवाँ
नज़्म
मुल्क-ए-सुख़न का तुझ सा फ़रमाँ-रवा न देखा
दुनिया-ए-शाइ'री का तुझ सा ख़ुदा न देखा
नारायण दास पूरी
नज़्म
रिफ़अत सरोश
नज़्म
न इस की बात में नर्मी न लब में अंगबीनी है
ब-फ़ैज़-ए-शाइरी घर में न घी है और न चीनी है
असद जाफ़री
नज़्म
बिठा कर मा'बद-ए-ज़र्रीं में ख़ुद नूरीं ख़ुदाओं को
किया है किस तरह ख़ुद ही उन्हें नाकाम लोगों ने