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नज़्म
जब ज़ेहन के सारे पर्दे अटके अटके से रह जाते हैं
जब शोर मचाती शाख़-ए-ज़बाँ से सारे परिंदे मर मर के
पैग़ाम आफ़ाक़ी
नज़्म
जब ज़ेहन के सारे पर्दे अटके अटके से रह जाते हैं
जब शोर मचाती शाख़-ए-ज़बाँ से सारे परिंदे मर मर के
पैग़ाम आफ़ाक़ी
नज़्म
ऐसा पैकर ऐसा चेहरा पहले कब देखा था मैं ने
मर मर की इक मूरत को चलते-फिरते देख लिया था
नसीम अंसारी
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कभी किया रम इश्क़ से ऐसे जैसे कोई वहशी आहू
और कभी मर-मर के सहर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कुछ कहना है और कुछ न कहे चले जाना ये कब तक चलेगा
तुम्हारा हम पर यूँ मर मर के जिए जाना ऐसा कब तक चलेगा
गीतांजली गीत
नज़्म
तू ने जिस आवाज़ को पाला है मर मर कर 'फ़िराक़'
आज उसी की नर्म लौ है शम-ए-मेहराब-ए-हयात
नाज़िश प्रतापगढ़ी
नज़्म
ये ज़िंदगी का जवाज़ क्या है
ये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँ