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नज़्म
न पुलिस का है इसे ख़ौफ़ न चालान का डर
है अगर डर तो उसी मर्द-ए-मुसलमान का डर
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
पी के इस सहबा को होतीं मोटरें मस्त-ए-ख़िराम
मैं तो हूँ मर्द-ए-मुसलमाँ मुझ पे पीना है हराम
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
किस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीद
है जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हराम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
तू मर्द-ए-मुसलमाँ है तो इक बात ज़रा सुन
आग़ोश-ए-तयक़्क़ुन से हक़ीक़त की सदा सुन
हिन्दी गोरखपुरी
नज़्म
मिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि है
उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मर्द-ए-ताजिर को ख़ुदा की ज़ात पर है ए'तिमाद
मर्द-ए-चाकर हर घड़ी अग़्यार का मुहताज है
फ़ैज़ लुधियानवी
नज़्म
गुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ का
बयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मर्द-ए-मुजाहिद मर्द-ए-जरी हो योद्धा हो बलवान हो तुम
साँची मदुरा अमृतसर अजमेर की अज़्मत तुम से है
अर्श मलसियानी
नज़्म
चार शख़्स आपस में थे इक रोज़ मसरूफ़-ए-नमाज़
बोल उठा उन में से ना-गहाँ एक मर्द-ए-हीला-बाज़