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नज़्म
मैं हमा-शौक़-ओ-मोहब्बत वो हमा-लुत्फ़-ओ-करम
मरकज़-ए-मर्हमत-ए-महफ़िल-ए-ख़ूबाँ हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
और बढ़ने के मवाक़े भी हमें देता है वक़्त
सब्ज़ को ज़र्रीं बताने की इजाज़त मर्हमत करता है और
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
वो देखो पौ फटी अँधियारे जादों के शिगाफ़ों से
हम उस को मरहमत का नाम देते हैं हर इक शिकवा
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
वो देखो पो फटी अँधियारे जादों के शिगाफ़ों से
हम इस को मरहमत का नाम देते हैं हर इक शिकवा
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
बाग़्बान-ए-चारा-फ़र्मा से ये कहती है बहार
ज़ख़्म-ए-गुल के वास्ते तदबीर-ए-मरहम कब तलक