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नज़्म
ख़्वाब से बे-दार होता है ज़रा महकूम अगर
फिर सुला देती है उस को हुक्मराँ की साहिरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिस अहद-ए-सियासत ने ये ज़िंदा ज़बाँ कुचली
उस अहद-ए-सियासत को मरहूम का ग़म क्यूँ है