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नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को
गुलज़ार
नज़्म
तुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वो
सब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ग़म ओ हिरमाँ की यूरिश है मसाइब की घटाएँ हैं
जुनूँ की फ़ित्ना-ख़ेज़ी हुस्न की ख़ूनीं अदाएँ हैं