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नज़्म
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल
राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
लचकती हुई नर्म टहनी को देखे
मगर बोझ पत्तों का उतरे हुए पैरहन की तरह सच के साथ ही फ़र्श पर एक मसला हुआ
मीराजी
नज़्म
मुझ से रोज़ यही कहता है पक्की सड़क पर मसला हुआ वो दाग़ लहू का
मैं ने तो पहली बार उस दिन
मजीद अमजद
नज़्म
जिस बाग़ में पली थी उस में सभी ने मसला
जिस गुल्सिताँ की जाँ थी उस में भी अब है रुस्वा
मोहम्मद ओवैस ख़ाँ
नज़्म
तुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वो
सब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वो