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नज़्म
अब कहाँ छोटा सा वो राधा का कुंज-ए-ख़ुश-गवार
अब कहाँ वो आह मथुरा तेरे फूलों की बहार
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
आतिश-ए-हिज्र कुछ इस दर्जा लगी है तन में
दिल न मथुरा में बहलता है न बिंदराबन में
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
फ़ख़्र-ए-शंकर हैं रुला-राम और मथुरा-दास भी
क़ाबिल-ए-इज़्ज़त नरिंदर-सिंह से सयास भी
अर्श मलसियानी
नज़्म
लिया मथुरा में जनम जा के रहा गोकुल में
पावँ के रखते ही अमृत मिला जमुना-जल में
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
चलो मथुरा सखी देखें रंगीले श्याम की झाँकी
ये अपने नाम का मोहन है अपने नाम की झाँकी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
इक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
तुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहीं
सादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद