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नज़्म
फ़न था इक मतलब-बरारी लोग थे मतलब-परस्त
इस-क़दर बिगड़ा हुआ था ज़िंदगी का बंदोबस्त
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
जिस में हो मतलब-परस्ती ज़ीस्त वो नाकाम है
ज़िंदगी आख़िर 'शिफ़ा' क़ुर्बानियों का नाम है
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
ये रक़्स-ए-आफ़रीनश है कि शोर-ए-मर्ग है ऐ दिल
हवा कुछ इस तरह पेड़ों से मिल मिल कर गुज़रती है