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नज़्म
तुम्हें मालूम है ना
हमारा सहन छोटा है और उस में चंद ख़्वाब ही ब-मुश्किल पूरे उतरते हैं
ज़ेहरा अलवी
नज़्म
जला कर जिस ने देखो उन को आख़िर ख़ाक कर डाला
मिटा कर उन को मिस्ल-ए-ख़स जहाँ को पाक ला
अहमद अज़ीमाबादी
नज़्म
आज का दिन कैसा बा-रौनक़ है बच्चो वाह वाह
मर्द बूढे हों कि बच्चे जा रहे हैं ईद-गाह
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
फैली है फ़ज़ाओं में ख़ुशी मेरी नज़र की
हँसती नज़र आती हैं फ़ज़ाएँ मिरे घर की
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ
चश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!