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नज़्म
सीटियाँ बजने लगीं ख़िदमत-ए-सरकार बजा लाना है
और सरकार ही ख़ुद संग-ए-रह-ए-मंज़िल है
मोहम्मद दीन तासीर
नज़्म
पड़ते ही निगाह-ए-साइक़ा-ए-ज़न जल उट्ठेगा हर नज़्म-ए-कुहन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
साग़र निज़ामी
नज़्म
बड़ी मुद्दत से सहन-ए-का'बा-ए-तन्हाई में हूँ
ए’तिकाफ़-ए-‘इश्क़ की हालत में एहराम-ए-वफ़ा बाँधे
शीराज़ सागर
नज़्म
सुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरह
शाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरह
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
हमारे दौर-ए-महकूमी की मुद्दत घटती जाती है
ग़ुलामी के ज़माने में इज़ाफ़ा होता जाता है
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
तुम ही तन्हा मिरे ग़म-ख़ाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रक्खा है