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नज़्म
क़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूर
और बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे
बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
किताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी है
ये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मोर-ए-बे-पर हाजते पेश-ए-सुलैमाने मबर
रब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों को
मिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वक़्त पर नहीं मिलतीं वक़्त पर नहीं आतीं
यानी उन को मेहनत का अज्र मिल तो जाता है
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
कि जब खमीर-ए-आब-ओ-गिल से वो जुदा हुए
तो उन को सम्त-ए-राह-ए-नौ की कामरानियाँ मिलें