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नज़्म
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मेरे जाम ओ मीना ओ गुल-दाँ के रेज़े मिले हैं
कि जैसे वो इस शहर-ए-बर्बाद का हाफ़िज़ा हों
नून मीम राशिद
नज़्म
तो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखो
कि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीना
तारिक़ क़मर
नज़्म
रक़्स-ए-मीना से उठे नग़्मा-ए-रक़्स-ए-बिस्मिल
साज़ ख़ुद अपने मुग़न्नी को गुनहगार करें
अहमद फ़राज़
नज़्म
जब शोला-ए-मीना सर्द हो ख़ुद जामों को फ़रोज़ाँ कौन करे
जब सूरज ही गुल हो जाए तारों में चराग़ाँ कौन करे