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नज़्म
सुनते हैं मज़दूर से मालिक का मोहरा पिट गया
''एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिक्खा था वो भी मिट गया''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
दूसरे दोहरे के रस्ते में तीसरा खेल का मुहरा है
तीसरा तिहरा जो है उस का सब से उजागर चेहरा है
मीराजी
नज़्म
उठ गया वो कौन सा मोहरा बिसात-ए-बज़्म से
सोग है हर घर में हर घर में बपा कोहराम है
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
''लाओ तो क़त्ल-नामा मिरा मैं भी देख लूँ
किस किस की मोहर है सर-ए-महज़र लगी हुई''