aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mol"
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहींमिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
जी मचलता था एक एक शय परजैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका
मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगेतुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं
चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डाल
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहींइंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तोली जाएगी
क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून कामरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुए
गर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसी
जाने कितने ख़रीदार थेबढ़ता जाता था यूसुफ़ का मोल
मिरा देस मीर-ए-सिपाह कामिरा शहर माल-ए-ग़नीम है
कुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भी
ग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी कामेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहीं
ये है मिल वाला वो बनिया है ये साहूकार हैये है दूकाँ-दार वो है वेद ये अत्तार है
था पारा-ए-दिल भी ज़ेर-ए-पिस्ताँलेकिन मिरा मोल है जो इन पर
तुम ज़र-ओ-सीम की मीज़ान में तुल सकती होप्यार बिकता नहीं चाहत का कोई मोल नहीं
शीशा सच्चा उजला जब तक ऊँचा उस का भावअपना मोल न जाना तुम ने कैसे गुन वाले हो
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा
आज इस अश्क-ए-नदामत का कोई मोल नहींआह एहसास की ज़ंजीर-ए-गिराँ टूट गई
दादा अब्बा मोल अगर लेंपोते के काम आती है
तुम ने वजूद का असास-उल-बैतफ़रहंगों के मोल बेच खाया
मेरी सी कहाँ चाशनी मेरा सा कहाँ रंगवो मोल में और तोल में मेरे नहीं पासँग
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