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नज़्म
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखा
अरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उसी की बख़्शिशें हैं उस ने सूरज चाँद तारों को
फ़ज़ाओं में सँवारा इक हद-ए-फ़ासिल मुक़र्रर की
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इक ऐसा ख़्वाब जिस के दामन-ए-सद-चाक में कोई मुबारक कोई रौशन दिन नहीं था
अभी कुछ दिन लगेंगे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
मुबारक हो कि फिर से हो गया ''डांस'' और ''डिनर'' चालू
ख़लास अहल-ए-नज़र होंगे हुआ दर्द-ए-जिगर चालू