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नज़्म
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
वो मुजस्सम हमहमा था वो मुजस्सम ज़मज़मा
वो अज़ल से ता अबद फैली हुई ग़ैबी सदाओं का निशाँ
नून मीम राशिद
नज़्म
दुख़तरन-ए-मग़रिबी को दे न औरत का ख़िताब
ये मुजस्सम हो गए हैं कुछ गुनहगारों के ख़्वाब
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सर पे झूमर पाँव में पाज़ेब इक ज़ोहरा-ख़िसाल
और मुजस्सम कहकशाँ उस के दुपट्टे का जमाल
हसरत जयपुरी
नज़्म
इक मुजस्सम ख़ुश्क-साली ख़ुद हमारी ज़ात है
ज़िद हमारी हस्तियों की अब्र है बरसात है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तो पूरी काएनात इस में मुजस्सम पाओगे और झूम जाओगे
किताबें पढ़ने वाले तो न मानेंगे