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नज़्म
तारिक़ क़मर
नज़्म
कुछ बता उस सीधी-साधी ज़िंदगी का माजरा
दाग़ जिस पर ग़ाज़ा-ए-रंग-ए-तकल्लुफ़ का न था
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
'बस्तामी'ओ-'बसरी'-ओ-'मुअर्रा'-ओ-'ग़ज़ाली'
जिस इल्म की जिस फ़क़्र की दुनिया के थे वाली
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
सितम की दास्ताँ कुश्ता दिलों का माजरा कहिए
जो ज़ेर-ए-लब न कहते थे वो सब कुछ बरमला कहिए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये कस दयार-ए-अदम में मुक़ीम हैं हम तुम
जहाँ पे मुज़्दा-ए-दीदार-ए-हुस्न-ए-यार तो क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मगर मैं ने अभी जो होश की आँखों से देखा है
वो मंज़र और ही कुछ कह रहा है माजरा क्या है