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नज़्म
तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
है अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूद
इन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़याम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नस्ल अगर मुस्लिम की मज़हब पर मुक़द्दम हो गई
उड़ गया दुनिया से तू मानिंद-ए-ख़ाक-ए-रह-गुज़र