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नज़्म
यूँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया
इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जो तुम चाहो तो बे-शक दौलत-ए-कौनैन मिल जाए
तुयूर-ए-'अर्श-ए-आ'ज़म हैं तुम्हारे राज़-दानों में
रज़ी बदायुनी
नज़्म
बहार-ए-गुलशन-ए-अफ़राद-ए-‘आलम तंदुरुस्ती है
मुक़द्दम तंदुरुस्ती है मुक़द्दम तंदुरुस्ती है
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
कहाँ के मुल्क-ए-सुलैमान-ओ-बाग़-ए-ख़ुल्द-ए-न’ईम
कहाँ के सिदरा-ओ-तूबा-ओ-कौसर-ओ-तसनीम
अख़्तर अंसारी
नज़्म
तू जिस घर में रहे ख़ुशियाँ वहीं आबाद हो जाएँ
तू मुल्क-ए-नाज़-ओ-ने'मत की हो शहज़ादी मुबारक हो
मीर अंजुम परवेज़
नज़्म
ज़मीर-ए-फ़ितरत-ए-इंसानियत को चौंका कर
उरूज-ए-क़िस्मत-ए-आदम दिखाएँगे हम लोग
अज़मत अब्दुल क़य्यूम ख़ाँ
नज़्म
डूबा हुआ हूँ ख़ाल-ए-दहन की रिसर्च में
टकरा रहा हूँ साहिल-ए-बहर-ए-अदम के साथ