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नज़्म
यूँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया
इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
बहार-ए-गुलशन-ए-अफ़राद-ए-‘आलम तंदुरुस्ती है
मुक़द्दम तंदुरुस्ती है मुक़द्दम तंदुरुस्ती है
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
जो तुम चाहो तो बे-शक दौलत-ए-कौनैन मिल जाए
तुयूर-ए-'अर्श-ए-आ'ज़म हैं तुम्हारे राज़-दानों में
रज़ी बदायुनी
नज़्म
वो तुलसी जिस की रामायण का इक इक सीन गुलशन है
वो तुलसी जिस का दुनिया-ए-अदब में नाम रौशन है
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
वो जिन में मुल्क-ए-बर्क़-ओ-बाद तक तस्ख़ीर होता है
जहाँ इक शब में सोने का महल तामीर होता है