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नज़्म
ये एक शम्अ जिसे सुब्ह का यक़ीन नहीं
जिगर के ज़ख़्म-ए-फ़रोज़ाँ से मुन्हरिफ़ क्यूँ है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
हम इस के ज़ौक़ से हुए अफ़्सोस मुन्हरिफ़
आज़ादी की तहरीक की उर्दू ही जान है
हबीब अहमद अंजुम दतियावी
नज़्म
कि जैसे फूल खिलते ही बहारें मुन्हरिफ़ हो जाएँ
कि जैसे इक चराग़ाँ हो मगर आँधी चली आए
शीराज़ सागर
नज़्म
अय्यूब ख़ावर
नज़्म
किसी को दुख न दो कि ये गुनाह है वबाल है
जो इस से मुन्हरिफ़ हुए तो ज़िंदगी मुहाल है