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नज़्म
तुम्हारे दिल ने उसे मुंतख़ब किया कि जिसे
तुम्हारे ग़म को समझने का भी शुऊर नहीं
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
जाए और मुझे मुर्दा-ख़ाने में अपना
बिस्तर मुंतख़ब करने में कोई मुश्किल पेश न आए
मुद्दस्सिर अब्बास
नज़्म
मुंतख़ब हम ने किया था एक मीर-ए-कारवाँ
वो बढ़ा जिस सम्त हर पीर-ओ-जवाँ बढ़ता गया
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
नहीं मालूम कोई मुंतहा-ए-ज़िंदगी भी है
कि जुज़ इक नाला-ए-गर्दिश नहीं सरमाया-ए-आलम