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नज़्म
कुकड़ूँ कूँ की तान लगा के मुर्ग़ा गाय ख़याल
क़ुमरी अपनी ठुमरी गाय मुर्ग़ी देवे ताल
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
मीराजी
नज़्म
दुंबा ज़र्राफ़े की गर्दन नापने को तय्यार हुआ
मुर्ग़ाबी के अंडे खा कर साँप बहुत बीमार हुआ
जमील उस्मान
नज़्म
अब वही मोर-पंख वही झील वही मुर्ग़ाबी के बच्चे
अख़रोट खाती गिलहरी और रंग बिखेरती तितली
रुबीना फ़ैसल
नज़्म
आवाज़ नहीं आती अब झील की जानिब से मुर्ग़ाबी की
सुनसान फ़ज़ा बे-जान हवा में लर्ज़ां रूह ख़मोशी की
क़य्यूम नज़र
नज़्म
ढल गया दिन और शबनम है ज़मीं पर क़तरा-रेज़
गोशा-ए-मग़रिब में गुलगूँ है शफ़क़ से आसमाँ
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
बहुत होंगे मुग़न्नी नग़्मा-ए-तक़लीद यूरोप के
मगर बेजोड़ होंगे इस लिए बे-ताल-ओ-सम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
शायर की नवा हो कि मुग़न्नी का नफ़स हो
जिस से चमन अफ़्सुर्दा हो वो बाद-ए-सहर क्या!