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नज़्म
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
ख़ाली हैं गरचे मसनद ओ मिम्बर, निगूँ है ख़ल्क़
रोअब-ए-क़बा ओ हैबत-ए-दस्तार देखना
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
और अपने फ़ज़्ल से देगा इजाज़त माँगने की कुछ
तो न दस्तार-ओ-क़बा न जिब्ह-ओ-ख़िरक़ा
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
मुझे दश्त-ए-तख़य्युल का सफ़र करना अगर आता
तवाफ़-ए-काबा करता, ज़िंदगी को सम्त मिल जाती
कौसर मज़हरी
नज़्म
ब-रब्ब-ए-काबा उस की याद में उम्रें गँवा दूँगा
मैं उस वादी के ज़र्रे ज़र्रे पर सज्दे बिछा दूँगा
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ये फूल जो ज़ीनत हैं किसी जेब-ओ-क़बा की
गुलशन की किसी शाख़-ए-तमन्ना पे खिले थे