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नज़्म
ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार
मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखा
अरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना है
अँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सुना? वो क़ादिर-ए-मुतलक़ है एक नन्ही सी जान
ख़ुदा भी सज्दे में झुक जाए सामने उस के
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मैं ख़ुदा-ए-क़ादिर-ए-मुतलक़ रहीम-ओ-अकरम से
जुनून-ए-मज़हबी के ख़ात्मे और अम्न की फ़ज़ा माँगूँगा
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
काम था तुझ को न मुतलक़ हस्ती-ए-नाकाम से
थी नवा वाबस्ता तेरी पर्दा-ए-इलहाम से