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नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सोते हैं ख़ामोश आबादी के हंगामों से दूर
मुज़्तरिब रखती थी जिन को आरज़ू-ए-ना-सुबूर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
छोड़ दे मुतरिब बस अब लिल्लाह पीछा छोड़ दे
काम का ये वक़्त है कुछ काम करने दे मुझे
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मैं कि मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त का पुराना मय-ख़्वार
महफ़िल-ए-हुस्न का इक मुतरिब-ए-शीरीं-गुफ़्तार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मिरे मुतरिब न दे लिल्लाह मुझ को दावत-ए-नग़्मा
कहीं साज़-ए-ग़ुलामी पर ग़ज़ल भी गाई जाती है
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
पर-फ़िशाँ है जज़्बा-ए-पिन्हाँ उभरने के लिए
मुज़्तरिब है ज़र्रा ज़र्रा रक़्स करने के लिए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इस वक़्त भी जब इक मुतरिब के होंटों पे ख़याल आ जाता है
संगत की देवी के रुख़ पर इक बार जमाल आ जाता है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मैं हूँ 'मजाज़' आज भी ज़मज़मा-ए-संज-ओ-नग़्मा-ख़्वाँ
शाइर-ए-महफ़िल-ए-वफ़ा मुतरिब-ए-बज़्म-ए-दिलबराँ