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नज़्म
और फिर उस इत्तिफ़ाक़ी वाक़े' ने तो ज़नान-ए-रोम में
आम कर दी बैज़ा-ए-महरम की तर्बियत की रस्म
कृष्ण मोहन
नज़्म
और फिर इस इत्तिफ़ाक़ी वाक़'ए ने तो ज़बान-ए-रोम में
'आम कर दी बैज़ा-ए-महरम की तर्बिय्यत की रस्म
कृष्ण मोहन
नज़्म
'अक़्ल है फ़िर'औन-ए-मिस्र 'इश्क़ है मूसा-ए-तूर
एक मा'तूब-ए-इलाह एक पर हक़ मेहरबाँ
मक़सूद अहमद मक़सूद
नज़्म
लाख सर मारा मगर उक़्दा-ए-मा'नी न खुला
कौन हूँ क्या हूँ मैं सद-हैफ़ न समझा असलन
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
आज भी 'कैफ़ी'-ओ-'महरूम' की आवाज़ हूँ मैं
आज भी 'साहिर'-ओ-'सरदार' का ए'जाज़ हूँ मैं
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
''लाओ तो क़त्ल-नामा मिरा मैं भी देख लूँ
किस किस की मोहर है सर-ए-महज़र लगी हुई''