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नज़्म
कई फ़साने जो अन-कहे थे कई तसव्वुर जो बे-ज़बाँ थे
हज़ार-हा सोज़-ओ-साज़ ऐसे जो पहले ना-क़ाबिल-ए-बयाँ थे
मख़मूर सईदी
नज़्म
नजमा नसीम
नज़्म
कई फ़साने जो अन-कहे थे कई तसव्वुर जो बे-ज़बाँ थे
हज़ार आलम नशात ओ ग़म के जो पहले ना-क़ाबिल-ए-बयाँ थे
मख़मूर सईदी
नज़्म
और हम क़िस्सा-ए-पारीना भी बनने के ना-क़ाबिल होंगे
यही बेहतर है आँख से ख़्वाब खुरच डालें सभी
शहज़ाद अंजुम बुरहानी
नज़्म
आँख के जलवों को जब हासिल है औज-ए-ए'तिबार
होश वालो ए'तिबार-ए-क़ल्ब-ए-बीना क्यों न हो