aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "naaKHun"
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहनाहै शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहनामगर मेरे ग़रीब अज्दाद ने भी कुछ किया होगाबहुत टुच्चा सही उन का भी कोई माजरा होगाये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकीहमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगाहै आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तरक़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
जादू है तेरी सौत का गुल पर हज़ार परजैसे नसीम-ए-सुब्ह की रौ जू-ए-बार परनाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार परमिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार परमौजें सबा की बाग़ पे सहबा छिड़क गईंजुम्बिश हुई लबों को तो कलियाँ चटक गईं
चीर के साल में दो बार ज़मीं का सीनादफ़्न हो जाता हूँगुदगुदाते हैं जो सूरज के सुनहरे नाख़ुनफिर निकल आता हूँअब निकलता हूँ तो इतना कि बटोरे जो कोई दामन मेंदामन फट जाएघर के जिस कोने में ले जा के कोई रख दे मुझेभूक वहाँ से हट जाएफिर मुझे पीसते हैं, गूँधते हैं, सेंकते हैंगूँधने सेंकने में शक्ल बदल जाती हैऔर हो जाती है मुश्किल पहचानफिर भी रहता हूँ किसानवही ख़स्ता, बद-हालक़र्ज़ के पंजा-ए-ख़ूनीं में निढालइस दरांती के तुफ़ैलकुछ है माज़ी से ग़नीमत मिरा हालहाल से होगा हसीं इस्तिक़बालउठते सूरज को ज़रा देखो तोहो गया सारा उफ़ुक़ लालों-लाल
और इस अर्सा-ए-अख़लाक़-ओ-मुरव्वत में कभीएक पल के लिए वो साअ'त-ए-नाज़ुक आ जाएनाख़ुन-ए-लफ़्ज़ किसी याद के ज़ख़्मों को छुएइक झिजकता हुआ जुमला कोई दुख दे जाएकौन जानेगा कि हम दोनों पे क्या बीती हैइस ख़मोशी के अँधेरों से निकल आएँ चलोकिसी सुलगे हुए लहजे से चराग़ाँ कर लेंचुन लें फूलों की तरह हम भी मता-ए-अल्फ़ाज़अपने उजड़े हुए दामन को गुलिस्ताँ कर लेंचुन लें फूलों की तरह हम भी मता-ए-अल्फ़ाज़दौलत-ए-दर्द बड़ी चीज़ है इक़रार करोने'मत-ए-ग़म बड़ी ने'मत है ये इज़हार करोलफ़्ज़ पैमान भी इक़रार भी इज़हार भी हैंताक़त-ए-सब्र अगर हो तो ये ग़म-ख़्वार भी हैंहाथ ख़ाली हूँ तो ये जिन्स-ए-गिराँ-बार भी हैंपास कोई भी न हो फिर तो ये दिलदार भी हैंहाथ ख़ाली हों तो ये जिन्स-ए-गिराँ-बार भी हैंये जो तुम मुझ से गुरेज़ाँ हो मिरी बात सुनो
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न दस्त-ओ-नाख़ुन-ए-क़ातिल न आस्तीं पे निशाँन सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँन ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न सर्फ़-ए-ख़िदमत-ए-शाहाँ कि ख़ूँ-बहा देतेन दीं की नज़्र कि बैआना-ए-जज़ा देतेन रज़्म-गाह में बरसा कि मो'तबर होताकिसी अलम पे रक़म हो के मुश्तहर होतापुकारता रहा बे-आसरा यतीम लहूकिसी को बहर-ए-समाअत न वक़्त था न दिमाग़न मुद्दई न शहादत हिसाब पाक हुआये ख़ून-ए-ख़ाक-नशीनाँ था रिज़्क़-ए-ख़ाक हुआ
तिरे पूरे बदन पर इक मुक़द्दस आग का पहरा हैजो तेरी तरफ़ बढ़ते हुए हाथों के नाख़ुन रोक लेता हैतिरे होंटों से निकले साँस की ख़ुश्बूदर-ओ-दीवार से रस्ता बना कर सारे बर्र-ए-'आज़मों में फैल सकती हैतिरी बाँहें अबद को जाने वाली शाहराहें हैंतिरी दाईं हथेली की लकीरें दूसरी दुनियाओं के नक़्शे हैं जो इन मुंशियों के बस से बाहर हैंतिरी आँखें नहीं ये देवताओं की पनह-गाहें हैंजिन में वक़्त जैसे ज़हर का तिर्याक़ हैतिरी ज़ुल्फ़ों की वुस'अत इस जहाँ की इंतिहाओं से परे तक हैतिरी गर्दन किसी जन्नत के पाकीज़ा दरख़्तों के तने को देख कर तरशी गई हैहमारे जिस्म पर से तेरी परछाई गुज़र जाएतो मुमकिन है कि हम इस मौत जैसे ख़ौफ़ से आज़ाद हो जाएँहमारे पास ऐसा क्या है जो तुझ को बता कर हम तुझे क़ाइल करेंबस इतना है कि अपने लफ़्ज़ बरसा कर तिरी छतरी पे बारिश फेंक देंगेया तिरे चेहरे पे अपनी नज़्म की इक सत्र से छाँव करेंगेधूप दे देंगेमगर क्या फ़ाएदा इस का कि मौसम ख़ुद तिरे जूतों के तस्मों से बंधे हैंतिरे हमराह चलने की कोई ख़्वाहिश अगर दिल में कभी थी भीतो हम ने तर्क कर दी हैहम इस लाइक़ नहीं हैंहमें मा'लूम है कि अगले वक़्तों में ये लोगतिरे पैरों के साँचों से नई सम्तों के अंदाज़े लगाएँगे
उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशाताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताबचाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिएउस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताबमाद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीमतास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाबपढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलामइश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाबकितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बनेकितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाबमार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनारज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाबउस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनासकर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़बबे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाबआफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमेंउस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाबकोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहींवक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाबअहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाललश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाबकाटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्बसतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आबआज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ सेरफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाबलड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दारजौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाबअपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यासदीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराबहज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ सेलरज़ा-बर-अंदाम यूँ शैताँ से करता है ख़िताबपंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगरटूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब
चाँद क्यूँ अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा थाउस के छुपते ही अंधेरों के निकल आए थे नाख़ुनऔर जंगल से गुज़रते हुए मासूम मुसाफ़िरअपने चेहरों को खरोंचों से बचाने के लिए चीख़ पड़े थे
साबुन की भीनी ख़ुश्बू से महक गया दालानउफ़ उन भीगी भीगी आँखों में दिल के अरमानमोतियों जैसे दाँतों में वो गहरी सुर्ख़ ज़बानदेख के गाल पे नाख़ुन का मद्धम सा लाल निशानकोई भी होता मेरी जगह पर हो जाता हैरान
जब नाख़ुन-ए-हिकमत ही टूटे दुश्वार को आसाँ कौन करेजब ख़ुश्क हुआ अब्र-ए-बाराँ ही शाख़ों को गुल-अफ़शाँ कौन करे
हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी सेव-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूलेदिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनकेतुम्हारे हाथ ने मेहंदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन नेगुलिस्ताँ की चमन की बाग़ की गुलज़ार की राखी
दोस्तों के नाख़ुन सेकितने ज़ख़्म खाए हैंउन की सम्त से दिल परकितने तीर आए हैं
मगर कोई तोड़े दे रहा हैलरज़ती मिज़्गाँ के नश्तरों कोदिलों के अंदर उतारता हैकोई सियासत के ख़ंजरों कोकिसी के ज़हरीले तेज़ नाख़ुनउक़ाब के पंजा-हा-ए-ख़ूनींकी तरह आँखों पे आ रहे हैंगुलाब से तन मिसाल-ए-बिस्मिलज़मीन पर तिलमिला रहे हैंजो प्यास पानी की मुंतज़िर थीवो सूलियों पर टंगी हुई हैवो भूक रोटी जो माँगती थीसलीब-ए-ज़र पर चढ़ी हुई हैये ज़ुल्म कैसा, सितम ये क्या हैमैं सोचता हूँ ये क्या जुनूँ हैजहाँ में नान-ए-जवीं की क़ीमतकिसी की इस्मत, किसी का ख़ूँ है
जाग ऐ नर्म-निगाही के पुर-असरार सुकूतआज बीमार पे ये रात बहुत भारी हैजो ख़ुद अपने ही सलासिल में गिरफ़्तार रहेउन ख़ुदाओं से मिरे ग़म की दवा क्या होगीसोचते सोचते थक जाएँगे नीले सागरजागते जागते सो जाएगा मद्धम आकाशइस छलकती हुई शबनम का ज़रा सा क़तराकिसी मासूम से रुख़्सार पे जम जाएगाएक तारा नज़र आएगा किसी चिलमन मेंएक आँसू किसी बिस्तर पे बिखर जाएगाहाँ मगर तेरा ये बीमार किधर जाएगामैं ने इक नज़्म में लिक्खा था कि ऐ रूह-ए-वफ़ाचारासाज़ी तिरे नाख़ुन की रहीन-मिन्नतग़म-गुसारी तिरी पलकों की रिवायात में हैएक छोटी ही सी उम्मीद-ए-तरब-ज़ार सहीएक जुगनू का उजाला मिरी बरसात में हैलज़्ज़त-ए-आरिज़-ओ-लब साअत-ए-तकमील-ए-विसालमेरी तक़दीर में है और तिरी बात में है
मिरा ज़ेहन दिल का रफ़ीक़ हैमिरा दिल रफ़ीक़ है जिस्म कामिरा जिस्म है मिरी आँख मेंमिरी आँख उस के बदन में हैवो बदन कि बोसा-ए-आतिशीं में जला भी फिर भी हरा रहावो बदन कि लम्स की बारिशों में धुला भी फिर भी नया रहावो बदन की वस्ल के फ़ासले पे रहा भी फिर भी मिरा रहामुझे ए'तिराफ़! मिरे वजूद पे एक चराग़ का एक ख़्वाब का एक उमीद का क़र्ज़ हैमुझे ए'तिराफ़! कि मेरे नाख़ुन-ए-बे-हुनर पे हज़ार तरह के क़र्ज़ हैंमिरा ज़ेहन मुझ को रिहा करे तो मैं सारे क़र्ज़ उतार दूँमिरी आँख मुझ से वफ़ा करे तो मैं जिस्म ओ जान पे वार दूँ
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसमहमें भी रो ले कि हम वही हैंजो आफ़्ताबों की बस्तियों से सुराग़ लाए थे उन सवेरों का जिन को शबनम के पहले क़तरों ने ग़ुस्ल बख़्शासफ़ेद रंगों से नूर-ए-मअ'नी निकाल लेते थे और चाँदी उजालते थेशफ़क़ पे ठहरे सुनहरे बादल से ज़र्द सोने को ढालते थेख़ुनुक हवाओं में ख़ुशबुओं को मिला के उन को उड़ाने वालेसबा की परतों पे शेर लिख कर अदम की शक्लें बनाने वालेदिमाग़ रखते थे लफ़्ज़ ओ मअ'नी का और दस्त-ए-हुनर के मालिकवक़ार-ए-नूर-ए-चराग़ हम थेहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्याहमें भी रो ले कि हम वही हैंजो तेज़ आँधी में साफ़ चेहरों को देख लेते थे और साँसों को भाँपते थेफ़लक-नशीनों से गुफ़्तुगूएँ थीं और परियों से खेलते थेकरीम लोगों की सोहबतों में कुशादा कू-ए-सख़ा को देखाकभी न रोका था हम को सूरज के चोबदारों ने क़स्र-ए-बैज़ा के दाख़िले सेवही तो हम हैंवही तो हम हैं जो लुट चुके हैं हफ़ीज़ राहों पे लुटने वालेउसी फ़लक की सियह-ज़मीं पर जहाँ पे लर्ज़ां हैं शोर-ए-नाला से आदिलों की सुनहरी कड़ियाँहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्याहमें भी रो ले कि इन दिनों में हमारी पुश्तों पे बार होता है ज़ख़्म-ए-ताज़ा के सुर्ख़ फूलों का और गर्दन में सर्द आहन की कोहना लड़ियाँहमारी ज़िद में सफ़ेद नाख़ुन क़लम बनाने में दस्त-ए-क़ातिल का साथ देते हैं और नेज़े उछालते हैंहवा की लहरों ने रेग-ए-सहरा की तेज़ धारों से रिश्ते जोड़ेशरीर हाथों से कंकरों की सियाह बारिश के राब्ते हैंहमारी ज़िद में ही मुल्कों मुल्कों के शहरयारों ने अहद बाँधेयही कि हम को धुएँ से बाँधें और अब धुएँ से बंधे हुए हैंसो हम पे रोने के नौहा करने के दिन यही हैं हुजूम-ए-गिर्याकि मुस्तइद हैं हमारे मातम को गहरे सायों की सर्द शामेंख़िज़ाँ-रसीदा तवील शामेंहमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसम
तुम मिरी आवाज़ दबा नहीं सकतेमिरे लिक्खे हुए अल्फ़ाज़ मिटा नहीं सकतेनहीं रख सकते मुझे पाबंद-ए-सलासिलतुम मिरी आवाज़ दबा नहीं सकोगेनाख़ुन-ए-शौक़ से रोज़ाना कुरेदूँगीमैं एक नई दीवारताकता पर्वाज़ से मुसख़्ख़र करूँगीनए जहानपर काट कर मिरेपिंजरे में मुक़य्यद नहीं कर सकते तुमख़्वाब नोच कर मिरी आँखें तस्ख़ीर नहीं कर सकते तुमऔरत हूँ मैंसाहब-ए-अक़्ल-ओ-फ़हम हूँबहता हुआ पानी हूँहर सदी की मैं ही कहानी हूँ
तुम्हारा अहद अगर उस्तुवार ही होतातो फिर भी दामन-ए-दिल तार तार ही होताख़ुद अपनी ज़ात ही नाख़ुन ख़ुद अपनी ज़ात ही ज़ख़्मख़ुद अपना दिल रग-ए-जाँ और ख़ुद अपना दिल नश्तरफ़साद-ए-ख़ल्क़ भी ख़ुद और फ़साद-ए-ज़ात भी ख़ुदसफ़र का वक़्त भी ख़ुद जंगलों की रात भी ख़ुद
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