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नज़्म
दामन-ए-कोहसार से ठंडी हवा आने लगी
नब्ज़-ए-ख़स में ज़िंदगी का ख़ून दौड़ाने लगी
सय्यद आबिद अली आबिद
नज़्म
हिज्र के आलाम से जब छुट चुकी नब्ज़-ए-नशात
अब हवा ने ख़ार-ओ-ख़स में रूह दौड़ाई तो क्या
जोश मलीहाबादी
नज़्म
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़
ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज भी नुक्ता-चीं हूँ मैं ख़ल्वतियान-ए-ख़ास का
ख़ल्वतियान-ए-ख़ास का आज भी हूँ मिज़ाज-दाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कि शो'ला-ज़न है रग-ए-ख़ार-ओ-ख़स में ज़ौक़-ए-नुमू
न अब वो गर्दिश-ए-अफ़्लाक है न दर्द-ए-हयात
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
और इस ज़र्रे का मैं जुज़्व-ए-हक़ीर
मेरा हिस्सा नब्ज़-ए-मआनी की ख़ुश-आहंगी में लफ़्ज़ों को नचाना