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नज़्म
ये शाख़-सार के झूलों में पेंग पड़ते हुए
ये लाखों पत्तियों का नाचना ये रक़्स-ए-नबात
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मैं गर्म दुपहरों का सपना जो पल-दो-पल में टूट गया
मैं मोर घनेरे जंगल का जो तन्हा सारा दिन नाचा
ज़ाहिद अज़ीम ज़ाहिद
नज़्म
वो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों में
गढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों में
जौन एलिया
नज़्म
ता'मीर के रौशन चेहरे पर तख़रीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी हर शहर में जंगल फैल गया