aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "namaaz"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँचश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूददिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गएरेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँआग बुझी हुई इधर, टूटी हुई तनाब उधरक्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँआई सदा-ए-जिब्रईल तेरा मक़ाम है यहीएहल-ए-फ़िराक़ के लिए ऐश-ए-दवाम है यहीकिस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयातकोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात मेंबैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ मेंने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलातक़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहींगरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद-ए-अव्वलीं है इश्क़इश्क़ न हो तो शर-ओ-दीं बुतकद-ए-तसव्वुरात!सिदक़-ए-ख़लील भी है इश्क़ सब्र-ए-हुसैन भी है इश्क़!म'अरका-ए-वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़!अाया-ए-कायनात का म'अनी-ए-देर-याब तू!निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला-हा-ए-रंग-ओ-बू!जलवतियान-ए-मदरसा कोर-निगाह ओ मुर्दा-ज़ाैक़जलवतियान-ए-मयकदा कम-तलब ओ तही-कदू!मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिशहै रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!फुर्सत-ए-कशमुकश में ईं दिल बे-क़रार रायक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू-ए-ताबदार रालौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाममेरा क़याम भी हिजाब! मेरा सुजूद भी हिजाब!तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गएअक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!तीरा-ओ-तार है जहाँ गर्दिश-ए-आफ़ताब से!तब-ए-ज़माना ताज़ा कर जल्वा-ए-बे-हिजाब से!तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शबमुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!ताज़ा मिरे ज़मीर में म'अर्क-ए-कुहन हुआ!इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा! अक़्ल तमाम बू-लहब!गाह ब-हीला मी-बरद, गाह ब-ज़ोर मी-कशदइश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब!आलम-ए-सोज़-ओ-साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़वस्ल में मर्ग-ए-आरज़ू! हिज्र में ल़ज़्जत-ए-तलब!एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न थागरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
बदल के भेस फिर आते हैं हर ज़माने मेंअगरचे पीर है आदम जवाँ हैं लात-ओ-मनातये एक सज्दा जिसे तू गिराँ समझता हैहज़ार सज्दे से देता है आदमी को नजात
ज़हे-क़िस्मत हिलाल-ए-ईद की सूरत नज़र आईजो थे रमज़ान के बीमार उन सब ने शिफ़ा पाईपहाड़ों से वो उतरे क़ाफ़िले रोज़ा-गुज़ारूँ केगया गरमी का 'मौसम और आए दिन बहारों केउठा होटल का 'पर्दा सामने पर्दा-नशीं आएजो छुप कर कर रहे थे एहतिराम-ए-हुक्म-ए-दीं आएहुई अँगूर की बेटी से ''मस्ती-ख़ान'' की शादीखुले दर मय-कदों के और मिली रिंदों को आज़ादीनवेद-ए-कामरानी ला रहे हैं रेस के घोड़ेमसर्रत के तराने गा रहे हैं रेस के घोड़ेमुबारक हो कि फिर से हो गया ''डांस'' और ''डिनर'' चालूख़लास अहल-ए-नज़र होंगे हुआ दर्द-ए-जिगर चालूनमाज़-ए-ईद पढ़ने के लिए सरकार आए हैंऔर उन के साथ सारे तालिब-ए-दीदार आए हैंयही दिन अहल-ए-दिल के वास्ते उम्मीद का दिन हैतुम्हारी दीद का दिन है हमारी ईद का दिन है
वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँवो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँहज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशींहर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगींशबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसेंवक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसेंअदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बांबयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बांसियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूमतवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूमवो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराएज़बान-ए-शेर को तारीफ़ करते शर्म आएवो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोशबहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोशगुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करेदराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करेग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहींवो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहींकिसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा थाब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा थाऔर अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसींहै इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकींहवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैंफ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैंग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र हैनियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मयस्सर है
इक मंज़िल के लिएकितनी मंज़िलें तय करता हैइंसान यहाँदो ढाई गज़ ज़मीं के लिएकितनी मुश्किलें सर करता हैइंसान यहाँअज़ान से नमाज़ तक का फ़क़त इक सफ़र हैबाक़ी सफ़र यूँही बेकार तय करता हैइंसान यहाँ
एक नज़्म कहीं से भी शुरूअ हो सकती हैजूतों की जोड़ी सेया क़ब्र से जो बारिश में बैठ गईया उस फूल से जो क़ब्र की पाईनी पर खिलाहर एक को कहीं न कहीं पनाह मिल गईचींटियों को जा-ए-नमाज़ के नीचेऔर लड़कियों को मिरी आवाज़ मेंमुर्दा बैल की खोपड़ी में गिलहरी ने घर बना लिया हैनज़्म का भी एक घर होगाकिसी जिला-वतन का दिल या इंतिज़ार करती हुई आँखेंएक पहिया है जो बनाने वाले से अधूरा रह गया हैइसे एक नज़्म मुकम्मल कर सकती हैएक गूँजता हुआ आसमान नज़्म के लिए काफ़ी होता हैलेकिन ये एक नाश्ता-दान में बा-आसानी समा सकती हैफूल आँसू और घंटियाँ इस में पिरोई जा सकती हैंइसे अंधेरे में गाया जा सकता हैत्यौहारों की धूप में सुखाया जा सकता हैतुम इसे देख सकती होख़ाली बर्तनों ख़ाली क़ब्ज़ों और ख़ाली गहवारों मेंतुम इसे सुन सकती होहाथ-गाड़ियों और जनाज़ों के साथ चलते हुएतुम इसे चूम सकती होबंदर-गाहों की भीड़ मेंतुम इसे गूँध सकती होपत्थर की माँद मेंतुम इसे उगा सकती होपोदीने की कियारियों मेंएक नज़्मकिसी भी रात से तारीक नहीं की जा सकतीकिसी तलवार से काटी नहीं जा सकतीकिसी दीवार में क़ैद नहीं की जा सकतीएक नज़्मकहीं भी साथ छोड़ सकती हैबादल की तरहहवा की तरहरास्ते की तरहबाप के हाथ की तरह
बाप कहता था कि फिर यूँ बाम पर ईमाँ के चढ़रोज़ा भी रख और रोज़े में नमाज़-ए-ईद पढ़
کہا مجاہد ترکي نے مجھ سے بعد نمازطويل سجدہ ہيں کيوں اس قدر تمھارے اماموہ سادہ مرد مجاہد ، وہ مومن آزادخبر نہ تھي اسے کيا چيز ہے نماز غلامہزار کام ہيں مردان حر کو دنيا ميںانھي کے ذوق عمل سے ہيں امتوں کے نظامبدن غلام کا سوز عمل سے ہے محرومکہ ہے مرور غلاموں کے روز و شب پہ حرامطويل سجدہ اگر ہيں تو کيا تعجب ہےورائے سجدہ غريبوں کو اور کيا ہے کامخدا نصيب کرے ہند کے اماموں کووہ سجدہ جس ميں ہے ملت کي زندگي کا پيام
सोच रहा हूँ जंग से पहले, झुलसी सी इस बस्ती मेंकैसा कैसा घर का मालिक, कैसा कैसा मेहमाँ थासब गलियों में तरनजन थे और हर तरनजन में सखियाँ थींसब के जी में आने वाली कल का शौक़-ए-फ़रावाँ थामेलों ठेलों बाजों गांजों बारातों की धूमें थींआज कोई देखे तो समझे, ये तो सदा बयाबाँ थाचारों जानिब ठंडे चूल्हे, उजड़े उजड़े आँगन हैंवर्ना हर घर में थे कमरे, हर कमरे में सामाँ थाउजली और पुर-नूर शबीहें रोज़ नमाज़ को आती थींमस्जिद के इन ताक़ों में भी क्या क्या दिया फ़रोज़ाँ थाउजड़ी मंडी, लाग़र कुत्ते, टूटे खम्बे ख़ाली खेतक्या इस नहर के पुल के आगे ऐसा शहर-ए-ख़मोशाँ था
अम्मी की ये जा-ए-नमाज़ मुझे दे दोमुझे पता हैइस में कितनी रौशन सुब्हें जज़्ब हुई हैंकितनी सन्नाटी दो-पहरेंइस की सीवन में ज़िंदा हैंमग़रिब के झट-पट अनवार की शाहिद है येआख़िर शब का गिर्याउस के ताने-बाने का हिस्सा हैमुझे पता हैअम्मी के पाकीज़ा सज्दों की सरगोशीउस के कानों में ज़िंदा हैउस के सच्चे सच्चे सज्देदेखो कैसे चमक रहे हैंउन के लम्स की ख़ुश्बूकैसी फूट रही हैअम्मी की ये जा-ए-नमाज़ बड़ी दौलत हैअम्मी की ये जा-ए-नमाज़ मुझे दे दो
दुआएँतुम भी तोमाँगती होमिली हो जब सेनमाज़ कोईक़ज़ा तुम्हारीनहीं हुई हैहँसी लबों से उड़ी हुई हैतुम्हारी रंगत बदल गई हैमगरदुआएँअसर ना लाएँ तो क्या करो तुम
तिरे जमाल से ऐ आफ़्ताब-ए-नन्कानानिखर निखर गया हुस्न-ए-शुऊ'र-ए-रिंदानाकुछ ऐसे रंग से छेड़ा रबाब-ए-मस्तानाकि झूमने लगा रूहानियत का मय-ख़ानातिरी शराब से मदहोश हो गए मय-ख़्वारदुई मिटा के हम आग़ोश हो गए मय-ख़्वारतिरा पयाम था डूबा हुआ तबस्सुम मेंभरी थी रूह-ए-लताफ़त तिरे तकल्लुम मेंनवा-ए-हक़ की कशिश थी तिरे तरन्नुम मेंयक़ीं की शम्अ' जलाई शब-ए-तवहहुम मेंदिलों को हक़ से हम-आहंग कर दिया तू नेगुलों को गूँध के यक-रंग कर दिया तू नेतिरी नवा ने दिया नूर आदमियत कोमिटा के रख दिया हिर्स-ओ-हवा की ज़ुल्मत कोदिलों से दूर किया सीम-ओ-ज़र की रग़बत कोकि पा लिया था तिरे दिल ने हक़ की दौलत कोहुजूम-ए-ज़ुल्मत-ए-बातिल में हक़-पनाही कीफ़क़ीर हो के भी दुनिया में बादशाही कीतिरी निगाह में क़ुरआन-ओ-दीद का आलमतिरा ख़याल था राज़-ए-हयात का महरमहर एक गुल पे टपकती थी प्यार की शबनमकि बस गया था नज़र में बहिश्त का मौसमनफ़स नफ़स में कली रंग-ओ-बू की ढलती थीनसीम थी कि फ़रिश्तों की साँस चलती थीतिरी शराब से बाबा फ़रीद थे सरशारतिरे ख़ुलूस से बे-ख़ुद थे सूफ़ियान-ए-किबारकहाँ कहाँ नहीं पहुँची तिरे क़दम की बहारतिरे अमल ने सँवारे जहान के किरदारतिरी निगाह ने सहबा-ए-आगही दे दीबशर के हाथ में क़िंदील-ए-ज़िंदगी दे दीतिरे पयाम से ऐसी की थी मसीहाईतिरे सुख़न में हबीब-ए-ख़ुदा की रानाईतिरे कलाम में गौतम का नूर-ए-दानाईतिरे तराने में मुरली का लहन-ए-यकताईहर एक नूर नज़र आया तेरे पैकर मेंतमाम निकहतें सिमटी हैं इक गुल-ए-तर मेंजहाँ जहाँ भी गया तू ने आगही बाँटीअँधेरी रात में चाहत की रौशनी बाँटीअता किया दिल-ए-बेदार ज़िंदगी बाँटीफ़साद-ओ-जंग की दुनिया में शांति बाँटीबहार आई खिली प्यार की कली हर सूतिरे नफ़स से नसीम-ए-सहर चली हर सूरज़ा-ए-हक़ को नजात-ए-बशर कहा तू नेतअ'ईनात-ए-ख़ुदी को ज़रर कहा तू नेवफ़ा-निगर को हक़ीक़त-निगर कहा तू नेज़ुहूर-ए-इश्क़ को सच्ची सहर कहा तू नेजहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न थातिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न थाबताया तू ने कि इरफ़ाँ से आश्ना होनाकभी न आशिक़-ए-दुनिया-ए-बे-वफ़ा होनाबदी से शाम-ओ-सहर जंग-आज़मा होनाख़ुदा से दूर न ऐ बंदा-ए-ख़ुदा होनानशे में दौलत-ओ-ज़र के न चूर हो जानाक़रीब आए जो दुनिया तो दूर हो जानाजो रूह बन के समा जाए हर रग-ओ-पै मेंतो फिर न शहद में लज़्ज़त न साग़र-ए-मय मेंवही है साज़ के पर्दे में लहन में लय मेंउसी की ज़ात की परछाइयाँ हर इक शय मेंन मौज है न सितारों की आब है कोईतजल्लियों के इधर आफ़्ताब है कोईअबद का नूर फ़राहम किया सहर के लिएदिया पयाम बहारों का दश्त-ओ-दर के लिएदिए जला दिए तारीक रहगुज़र के लिएजिया बशर के लिए जान दी बशर के लिएदुआ ये है कि रहे इश्क़ हश्र तक तेराज़मीं पे आम हो ये दर्द-ए-मुश्तरक तेराख़ुदा करे कि ज़माना सुने तिरी आवाज़हर इक जबीं को मयस्सर हो तेरा अक्स-ए-नियाज़जहाँ में आम हो तेरे ही प्यार का अंदाज़ख़ुलूस-ए-दिल से हो पूजा ख़ुलूस-ए-दिल से नमाज़तिरे पयाम की बरकत से नेक हो जाएँये इम्तियाज़ मिटें लोग एक हो जाएँ
कैसी निखरी सी नज़र आती है फ़ज़ा ईद के रोज़शादमाँ फिरते हैं सब शाह-ओ-गदा ईद के रोज़कितनी बे-फ़िक्री से गाते हैं गदा राहों मेंपेट ख़ाली हो तो गाएँ भी न क्या ईद के रोज़क्या भली लगती है हर पीर-ओ-जवाँ के मुँह सेहर तरफ़ ईद मुबारक की सदा ईद के रोज़अम्मी ख़ुश होंगी और ईदी भी वही पाएगावक़्त से पहले जो बेदार हुआ ईद के रोज़चाँद उनतीस को क्या निकला कि आधी शब सेटेलरिंग शाप में इक ताँता बँधा ईद के रोज़कपड़े भी धुल न सके वक़्त-ए-नमाज़ आ पहूँचालॉन्ड्री वालों पे आफ़त है बपा ईद के रोज़दादी अम्माँ ने मुसल्ले को परे डाल दियाघर में मेहमानों का वो शोर मचा ईद के रोज़आँख ओझल हुई और टूट सवैयों पे पड़ादेर से असलम इसी ताक में था ईद के रोज़ईद-गह शान से टम टम पे चले हैं बब्बनबाप के काँधों पे नन्हा भी चढ़ा ईद के रोज़पकड़े लाठी को मटकते चले रमज़ानी मियाँपीछे से बच्चों का इक गोल चला ईद के रोज़अपने बेगाने जो बढ़ बढ़ के गले मिलते होंक्यों न फिर आए इबादत में मज़ा ईद के रोज़रोज़े रमज़ान के रखना तो सभी भूल गएकैसे भूलेंगे सवैयों को भला ईद के रोज़साल के साल रहे याद-ए-ख़ुदा से ग़ाफ़िलऐ 'ज़की' उन को भी याद आया ख़ुदा ईद के रोज़
वाह ये लड़की है कितनी पाक साफ़साफ़ कपड़े साफ़ चेहरा नाक साफ़मैल दाँतों पर न नाख़ुन में कहींऔर कपड़ों पर कहीं धब्बा नहींसाफ़ सुथरे धोया मोती हाथ पाँवचाहता है दिल कलेजे से लगाऊँआओ बेबी आओ जल्दी पास आओइक मज़े का प्यार हम को दे के जाओआते ही पहले किया उस ने सलामफिर जो पूछा तो बताया अपना नामगोद में ले कर किया पहले तो प्यारफिर कहा बेटी मैं तुम पर से निसारआप क्या पढ़ती हैं क्या करती हैं कामआप के वालिद का है किस जा मक़ामभोली लड़की ने दिया हम को जवाबदूसरी उर्दू की पढ़ती हूँ किताबफ़र्स्ट रीडर पहली दीनियात कीऔर कलाम-उल-लाह सारा पढ़ चुकीहिफ़्ज़ है कश्फ़-उल-ख़ुलासा सब मुझेयाद है हर शे'र का मतलब मुझेसाफ़ सुथरी है मेरी हर एक चीज़मुझ को अम्माँ ने सिखाई ये तमीज़साफ़ बिस्तर साफ़ कमरा साफ़ घरमैं ने पूछा बात उस की काट करहाथ मुँह कब धोती हो उस ने कहाफज्र-ओ-ज़ोहर अस्र-ओ-मग़रिब और इशापाँच वक़्तों की मैं पढ़ती हूँ नमाज़जूती को लगता नहीं बोल-ओ-बराज़चौथे दिन नहा कर बदलती हूँ लिबासछावाँ साबुन कंघी है सब मेरे पासदाँत मेरे साफ़ भी हैं पाक भीमेरे हाँ मंजन भी है मिसवाक भीआई पढ़ने को अलीगढ़ साल हालउम्र के गुज़रे हैं मेरे आठ सालइस से भी कम था बहुत जब मेरा सिनसाफ़ रक्खी जाती थी मैं रात दिनमेरे वालिद हैं ग़ुलाम पंजतनमेरा घर है हैदराबाद दकनसुन के उस पाकीज़ा लड़की के जवाबमैं नय दीं कैफ़ी दुआएँ बे-हिसाब
नमाज़ को जो जाओगेख़ुदा का क़ुर्ब पाओगेकहेंगे तुम को नेक सबमिलेगा तुम को प्यारा रबउठो उठो नमाज़ कोचलो चलो नमाज़ कोहै मुख़्तसर सी ज़िंदगीनहीं है अच्छी काहिलीख़ुदा का उठ के नाम लोचलो तो सब ये कहोउठो उठो नमाज़ कोचलो चलो नमाज़ कोवुज़ू करो वुज़ू करोमगर ध्यान ये रखोवुज़ू से तन भी साफ़ होवुज़ू से मन भी साफ़ होउठो उठो नमाज़ कोचलो चलो नमाज़ कोसदा रखें ये ध्यान अबकि ख़त्म हो अज़ान जबहर एक काम छोड़ देंख़ुदा से दिल को जोड़ लेंउठो उठो नमाज़ कोचलो चलो नमाज़ को
ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद
दिन भर ये घर में सोती है सड़कों पे शाम से भागती हैआज़ाद तबीअ'त ऐसी है शादी के नाम से भागती हैरोज़ा ओ नमाज़ की क़ाइल है सज्दा ओ क़याम से भागती हैइस्लाम-अली की बेटी है लेकिन इस्लाम से भागती है
बदन से पूरी आँख है मेरीजाओ जा-नमाज़ से अपनी पसंद की दुआ उठा लोहर रंग की दुआ मैं माँग चुकीबाग़बाँ दिल का बीज तेरे पास भी न होगादेखो धुएँ में आग कैसे लगती हैमेरे पैरहन की तपिश मिट्टी कैसे जलाती हैबदन से पूरी आँख है मेरीनिगाह जो तने की ज़रूरत ही क्या पड़ी हैमेरी बारिशों के तीन रंग हैंटूटी कमान पे एक निशान ख़ता का पड़ा हैहम चाहें तो सूरज हमारी रोटी पकाएऔर हम सूरज को तंदूर करेंफ़ैसला चुका दिया ख़ता अपनी भूल गएनज़र करने आए थे चुटकी भर आँखआँख तेरी गलियों में तो बाज़ार हैंज़मीन आँख छोड़ कर समुंदर में सो रहीजंगल तो सिर्फ़ तलाश हैघर तो काएनात के पिछवाड़े ही रह गयाशिकार कमान में फँस फँस कर मरातुम कैसे शिकारीआँखें तेवरों से जल रही हैंजिस्म ज़िंदगी की मुलाज़मत में हैतन्हाई कश्कोल हैहम ने आँखों से शमशीर खींचीऔर रुख़्सत की तस्वीर बनाईरात गोद में सुलाईऔर चाँद का जूता बनवायाहम ने राह में अपने पैरों को जना
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