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नज़्म
तेरे हाथों में है क़िस्मत का नविश्ता अपना
किस क़दर तुझ से भी मज़बूत है रिश्ता अपना
जोश मलीहाबादी
नज़्म
परिंदा भी नहीं कोई कि जिस के पाँव से कोई
नविश्ता बाँध कर भेजूँ तो समझूँ उस से मिलने का
अब्बास ताबिश
नज़्म
अस्ल जो इबारत हो पस नविश्त हो जाए
फ़स्ल-ए-गुल के आख़िर में फूल उन के खुलते हैं