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नज़्म
निगाह-ए-मस्त से दिल को मिरे तड़पा रही है तू
अदा-ए-शौक़ से जज़्बात को भड़का रही है तू
अख़्तर शीरानी
नज़्म
निगाह-ए-मस्त से उस की बहक जाती थी कुल वादी
हवाएँ पर-फ़िशाँ रूह-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
निगाह-ए-मस्त की अल्लाह-रे मासूम ताकीदें
मुझे है हुक्म साज़-ए-मुफ़्लिसी पर गुनगुनाने का
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
जामे से बाहर निगाह-ए-नाज़-ए-फ़त्ताहान-ए-हिन्द
हद्द-ए-क़ानूनी के अंदर ऑनरेबलों की क़तार
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
हम पे रहती है निगाह-ए-शफ़क़त-ए-अहल-ए-नज़र
महफ़िल-ए-शेर-ओ-अदब में जाने-पहचाने हैं हम