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नज़्म
ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में बहारें छुपी हुई
इक कारवान-ए-निकहत-ए-बुसताँ लिए हुए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मस्जिदें भी हैं मनादिर भी हैं गिरिजा-घर भी
निकहत-ओ-नूर में डूबा हुआ हर मंज़र भी
अमीर अहमद ख़ुसरव
नज़्म
वही ग़ुंचों की शादाबी वही फूलों की निकहत है
वही सैर-ए-गुलिस्ताँ है वही जोश-ए-मसर्रत है
शौकत परदेसी
नज़्म
मैं ने चाहा था कि तारों की बुझा दूँ शमएँ
निकहत-ओ-नूर के साँचे में जो देखा था उसे
अब्दुल मजीद भट्टी
नज़्म
ख़िज़ाँ का हात शाख़-ए-तर से तोड़ कर चला गया
मैं एक सम्त फ़लसफ़े के अन-गिनत निकात की पनाह हूँ
सहर अंसारी
नज़्म
सुन ऐ फ़रेफ़्ता-ए-क़िस्सा-हा-ए-हिज्र-ओ-विसाल
अमीक़-तर हैं समुंदर से ज़िंदगी के निकात