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नज़्म
यहीं की थी मोहब्बत के सबक़ की इब्तिदा मैं ने
यहीं की जुरअत-ए-इज़हार-ए-हर्फ़-ए-मुद्दआ मैं ने
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
अज़्मत-ए-आदम से कर के मुंज़बित अपना सुख़न
ग़म-ज़दों को जुरअत-ए-ज़ौक़-ए-सफ़र देता है वो
हबीब जौनपुरी
नज़्म
वो शिद्दत-ए-बयाँ हो कि हो जुरअत-ए-बयान-ए-हक़
गुस्ताख़ इतनी हो गई मेरी ज़बाँ कभी कभी