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नज़्म
सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
नौबत नक़्क़ारे बान निशान दौलत हशमत फ़ौजें लश्कर
क्या मसनद तकिया मुल्क मकाँ क्या चौकी कुर्सी तख़्त छतर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
निशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचीं
तिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कोई मेरे सिवा उस का निशाँ पा ही नहीं सकता
कोई उस बारगाह-ए-नाज़ तक जा ही नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सर पे रख सकता हूँ ताज-ए-किश्वर-ए-नूरानियाँ
महफ़िल-ए-ख़ुर्शीद को नीचा दिखा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मेरा इल्हाम तिरा ज़ेहन-ए-रसा भी पत्थर
इस ज़माने में तो हर फ़न का निशाँ पत्थर है