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नज़्म
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो मेरे आसमाँ पर अख़्तर-ए-सुब्ह-ए-क़यामत है
सुरय्या-बख़्त है ज़ोहरा-जबीं है माह-ए-तलअत है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
लेकिन ऐसा रौशन-रौशन हँसता बातें करता चाँद
दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर था
सफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम से