aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "package"
सड़क मसाफ़त की उजलतों मेंघिरे हुए सब मुसाफ़िरों कोब-ग़ौर फ़ुर्सत से देखती हैकिसी के चेहरे पे सुर्ख़ वहशत चमक रही हैकिसी के चेहरे से ज़र्द हैरत छलक रही हैकिसी की आँखें हरी-भरी हैंकबीर हद से उभर रहा हैसग़ीर क़द से गुज़र रहा हैकिसी का टायर किसी के पहिए को खा रहा हैकिसी का जूता किसी की चप्पल चबा रहा हैकिसी के पैरों में आ रहा है किसी का बच्चाकिसी का बच्चा किसी के शाने पे जा रहा हैकोई ठिकाने पे कोई खाने पे जा रहा हैहबीब दस्त-ए-रक़ीब थामेग़रीब-ख़ाने पे जा रहा हैअमीर पिंजरा बना रहा हैग़ुलाम कर्तब दिखा रहा हैऔर अपने बेटे के साथ छत परअमीन कुंडा लगा रहा हैनिज़ाम तांगा चला रहा हैकिसी कलाई पे जगमगाती हुई घड़ी हैमगर अभी वो रुकी हुई हैकिसी के चेहरे पे बारा बजने में पाँच सेकेंड रह गए हैंकिसी की हाथी-नुमा प्राडोसड़क से ऐसे गुज़र रही हैसिवाए इस के कहीं भी जैसे कोई नहीं होकिसी की मूँछें झुकी हुई हैंकिसी की बांछें खिली हुई हैंकिसी की टैक्सी किसी की फ़ोकसी मिली हुई हैंकिसी के लब और किसी की आँखें सिली हुई हैंकिसी के कपड़े फटे हुए हैंकिसी की पगड़ी चमक रही हैकिसी की रंगत किसी की टोपी उड़ी हुई हैशरीफ़ नज़रें उठा उठा करकमान जिस्मों पे अपनी वहशत के तीर कब से चला रहा हैनज़ीर नज़रें चुरा रहा हैनफ़ीस अपने कलफ़ की शिकनों को रो रहा हैहकीम अपने मतब के शीशों को धो रहा हैकिसी की आँखों के धुँदले शीशों में उस के माज़ी की झलकियाँ हैंकिसी की आँखों में आने वाले हसीन लम्हों की मस्तियाँ हैंकिसी की आँखों में रत-जगों की कुछ अर्ग़वानी सी डोरियाँ हैंकिसी के काँधे पे उस के ख़्वाबों की बोरियाँ हैंकबाड़-ख़ाने पे बासी टुकड़ों की ओर किताबों की बोरियाँ हैंबुज़ुर्ग बरगद के नीचे बूढ़ा खड़ा हुआ हैऔर उस के हाथों में टेप लिपटी हुई छड़ी हैपुलीस की गाड़ी पिकिट लगा करसड़क पे तिरछी खड़ी हुई हैऔर एक मज़दूर अपना दामन उठाए बे-बस खड़ा हुआ हैऔर इक सिपाही कि उस के नेफ़े में उँगलियों को घुमा रहा हैवहीं पे शाहिद सियाह चश्मा लगा के ख़ुद को छुपा रहा हैन्यूज़ चैनल की छोटी गाड़ी बड़ी ख़बर की तलाश में हैदो सब्ज़ी वाले भी अपनी फेरी लगा रहे हैंतो फूल वाले के सर पे फूलों की टोकरी हैकिसी की आँखों में नौकरी हैकिसी की आँखों में छोकरी हैवक़ार सर को झुका रहा हैफ़राज़ खाई में जा रहा हैतो गीली सिगरेट के कश लगा करनवाब रिक्शा चला रहा हैसलीम कन्नी घुमा रहा हैवकील वर्दी में जा रहा हैज़मीर बग़लें बजा रहा हैऔर एक वाइज़ बता रहा हैख़ुदा को नाराज़ करने वाले जहन्नमी हैंख़ुदा को राज़ी करो ख़ुदाराख़ुदा को राज़ी करो ख़ुदाराऔर उस के आगे नसीर अकमल कमाल शादाब ग़ुलाम सारेनज़र झुकाए खड़े हुए हैंकि चश्म-ए-बीना अगर कहीं हैतो समझो पाताल तक गढ़ी हैकिसी को ए-सी ख़रीदना हैकिसी को पी सी ख़रीदना हैकिसी की बस और किसी की बी-सी निकल रही हैअक़ीला ख़ाला के दोनों हाथों में आठ थैले लटक रहे हैंऔर आते जाते सभी मुसाफ़िरउन्हें मुसलसल खटक रहे हैंज़िया अँधेरे में जा रहा हैगुलाब कचरा जला रहा हैअज़ीम मक्खी अड़ा रहा हैकलीम गुटका चबा रहा हैतो घंटा-पैकेज पे जाने कब सेफ़हीम गप्पें लड़ा रहा हैसबक़ मुसावात का सिखानेवज़ीर गाड़ी में जा रहा हैसना निदा को नए लतीफ़े सुना रही हैहिना हथेली को तकते तकते पुराने रस्ते से आ रही हैऔर अपनी भावज का हाथ थामेज़ुबैदा चैक-अप को जा रही हैवो अपनी नज़रें कभी इधर को कभी अधर को घुमा रही हैमगर कोई शय उसे मुसलसल बुला रही रही हैअजीब उजलत अजीब वहशत अजीब ग़फ़लत का माजरा हैकहूँ मैं किस से मिरे ख़ुदाया ये कैसी ख़िल्क़त का माजरा हैकि अपनी मस्ती में मस्त हो करये सब मुसाफ़िर गुज़र रहेनए मुसाफ़िर उभर रहे हैंसड़क जहाँ थी वहीं खड़ी हैमगर हक़ीक़त बहुत बड़ी हैसड़क पे बिल्ली मरी पड़ी है
सुनोतुम क्यूँ नहीं कहतेमिरे आँसू तुम्हें तकलीफ़ देते हैंमिरे दुख सुन के तुम भी बेबसी महसूस करते होमेरी आवाज़ की लर्ज़िश तुम्हें भी ख़ूँ रुलाती हैमेरे लहजे की नमनाकी तुम्हें बेचैन रखती हैमुझे मा'लूम है लेकिन ये सब तुम कह नहीं सकतेउसी लम्हे तुम्हें याद आने लगते हैंकई बेहद ज़रूरी काम और फिर तुमअचानक मुंक़ता' करते हो टेलीफ़ोन की लाइनफिर एक मैसेज में लिखते होमुझे अफ़्सोस है पैकेज अचानक ख़त्म होने परतो फिर कल बात करते हैंमगर मैं जानती हूँ इस बहाने कोमुझे मा'लूम है जानाँमिरे आँसू तुम्हें तकलीफ़ देते हैं
मोहब्बत की एक नज़्मअगर कभी मेरी याद आएतो चाँद रातों की नर्म दिल-गीर रौशनी मेंकिसी सितारे को देख लेनाअगर वो नख़्ल-ए-फ़लक से उड़ करतुम्हारे क़दमों में आ गिरेतो ये जान लेना वो इस्तिआ'रा था मेरे दिल काअगर न आएमगर ये मुमकिन ही किस तरह हैकि तुम किसी पर निगाह डालोतो उस की दीवार-ए-जाँ न टूटेवो अपनी हस्ती न भूल जाएअगर कभी मेरी याद आएगुरेज़ करती हवा की लहरों पे हाथ रखनामैं ख़ुशबुओं में तुम्हें मिलूँगामुझे गुलाबों की पत्तियों में तलाश करनामैं ओस-क़तरों के आईनों में तुम्हें मिलूँगाअगर सितारों में ओस-क़तरों में ख़ुशबुओं में न पाओ मुझ कोतो अपने क़दमों में देख लेना मैं गर्द होती मसाफ़तों में तुम्हें मिलूँगाकहीं पे रौशन चराग़ देखोतो जान लेना कि हर पतंगे के साथ मैं भी बिखर चुका हूँतुम अपने हाथों से उन पतंगों की ख़ाक दरिया में डाल देनामैं ख़ाक बन कर समुंदरों में सफ़र करूँगाकिसी न देखे हुए जज़ीरे पेरुक के तुम को सदाएँ दूँगासमुंदरों के सफ़र पे निकलोतो उस जज़ीरे पे भी उतरना
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखासरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैंआँखों से मानूस थे सारेचेहरे सारे सुने सुनाएपाँव धोए, हाथ धुलाएआँगन में आसन लगवाएऔर तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाएपोटली में मेहमान मिरेपिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे
अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करोजब दिल टुकड़े हो जाएगाऔर सारे ग़म मिट जाएँगेजो कुछ पाया खो जाएगाजो मिल न सका वो पाएँगेये दिन तो वही पहला दिन हैजो पहला दिन था चाहत काहम जिस की तमन्ना करते रहेऔर जिस से हर दम डरते रहेये दिन तो कई बार आयासौ बार बसे और उजड़ गएसौ बार लुटे और भर पाया
चौदहवीं-रात के बर्फ़ाब से इक चाँद को जबढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैंतुम ने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग करअपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है?
तेरे होंटों से बहती हुई ये हँसीदो-जहानों पे नाफ़िज़ न होने का बाइसतिरे हाथ हैंजिन को तू ने हमेशा लबों पर रखा मुस्कुराते हुएतू नहीं जानतीनींद की गोलियाँ क्यों बनाई गईंलोग क्यों रात को उठ के रोते हैं सोते नहींतू ने अब तक कोई शब अगर जागते भी गुज़ारीतो वो बार्बी नाईट थीतुझ को कैसे बताऊँकि तेरी सदा के त'आक़ुब मेंमैं कैसे दरियाओं सहराओं और जंगलों से गुज़रता हुआएक ऐसी जगह जा गिरा थाजहाँ पेड़ का सूखना 'आम सी बात थीजहाँ उन चराग़ों को जलने की उजरत नहीं मिल रही थीजहाँ लड़कियों के बदन सिर्फ़ ख़ुशबू बनाने के काम आते थेजहाँ एक मा'सूम बच्चा परिंदे पकड़ने के सारे हुनर जानता थामुझ को मा'लूम थातेरा ऐसे जहाँ ऐसी दुनिया से कोई त'अल्लुक़ नहींतू नहीं जानतीकितनी आँखें तुझे देखते देखते बुझ गईंकितने कुर्ते तिरे हाथ से इस्त्री हो के जलने की ख़्वाहिश में खूँटी से लटके रहेकितने लब तेरे माथे को तरसेकितनी शहराहें इस शौक़ में फट गई हैंकि तू उन के सीने पे पाँव धरेमैं तुझे ढूँडते ढूँढते थक गया हूँअब मुझे तेरी मौजूदगी चाहिएअपने साटन में सहमे हुए सुर्ख़ पैरों को अब मेरे हाथों पे रखमैं ने चखना है इन का नमक
सेल्फ़ मेड लोगों का अलमियारौशनी मिज़ाजों का क्या अजब मुक़द्दर हैज़िंदगी के रस्ते में बिछने वाले काँटों कोराह से हटाने मेंएक एक तिनके से आशियाँ बनाने मेंख़ुशबुएँ पकड़ने में गुलिस्ताँ सजाने मेंउम्र काट देते हैंउम्र काट देते हैंऔर अपने हिस्से के फूल बाँट देते हैंकैसी कैसी ख़्वाहिश को क़त्ल करते जाते हैंदरगुज़र के गुलशन में अब्र बन के रहते हैंसब्र के समुंदर में कश्तियाँ चलाते हैंये नहीं कि उन को इस रोज़-ओ-शब की काहिश काकुछ सिला नहीं मिलतामरने वाली आसों का ख़ूँ-बहा नहीं मिलताज़िंदगी के दामन में जिस क़दर भी ख़ुशियाँ हैंसब ही हाथ आती हैंसब ही मिल भी जाती हैंवक़्त पर नहीं मिलतीं वक़्त पर नहीं आतींयानी उन को मेहनत का अज्र मिल तो जाता हैलेकिन इस तरह जैसेक़र्ज़ की रक़म कोई क़िस्त क़िस्त हो जाएअस्ल जो इबारत हो पस नविश्त हो जाएफ़स्ल-ए-गुल के आख़िर में फूल उन के खुलते हैंउन के सहन में सूरज देर में निकलते हैं
दिल में गर प्यार होलब पे इक़रार होप्यार ही प्यार बसहर्फ़-ए-इज़हार होगर अना ये कहेदिल न मिल पाएँगेइस पे मत जाइएखोटी हे ये अनाइस से कुछ न बनादिल की बातें सुनोफ़ासले से सहीहप्यार करते रहोऔर कुछ न कहोरस्ता एक है
क़ौम से जो तुम्हारे बरतावसोचो ऐ मेरे प्यारो और शरमाओअहल-ए-दौलत को है ये इस्तिग़्नाकि नहीं भाइयों की कुछ पर्वाशहर में क़हत की दुहाई हैजान-ए-आलम लबों पे आई हैबच्चे इक घर में बिलबिलाते हैंरो के माँ बाप को रुलाते हैंकोई फिरता है माँगता दर दरहै कहीं पेट से बँधा पत्थरपर जो हैं उन में साहिब-ए-मक़्दूरउन में गिनती के होंगे ऐसे ग़यूरकि जिन्हें भाइयों का ग़म होगाअपनी राहत का ध्यान कम होगाजितने देखोगे पाओगे बे-दर्ददिल के नामर्द और नाम के मर्दऐश में जिन के कटते हैं औक़ातईद है दिन तो शब्बरात है रातक़ौम मरती है भूक से तो मरेकाम उन्हें अपने हलवे-मांडे सेइन को अब तक ख़बर नहीं असलनशहर में भाव क्या है ग़ल्ले काग़ल्ला अर्ज़ां है इन दिनों कि गिराँकाल है शहर में पड़ा कि समाँकाल क्या शय है किस को कहते हैं भूकभूक में क्यूँकि मरते हैं मफ़लूकसेर भूके की क़द्र क्या समझेउस के नज़दीक सब हैं पेट भरे
वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगेमर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगेये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगाइस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगामुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न देकाँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न देमुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बनेसीने में दहकते शोले हों हर साँस कोई आज़ार बनेऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेनाग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेनाहो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने काजो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने कालेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहींजो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहींतन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगेसौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगेइंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना हैऔरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है
तुझ से मुँह मोड़ के मुँह अपना दिखाएँगे कहाँघर जो छोड़ेंगे तो फिर छावनी छाएँगे कहाँबज़्म-ए-अग़्यार में आराम ये पाएँगे कहाँतुझ से हम रूठ के जाएँ भी तो जाएँगे कहाँतेरे हाथों में है क़िस्मत का नविश्ता अपनाकिस क़दर तुझ से भी मज़बूत है रिश्ता अपना
जब तक चंद लुटेरे इस धरती को घेरे हैंअपनी जंग रहेगीअहल-ए-हवस ने जब तक अपने दाम बिखेरे हैंअपनी जंग रहेगीमग़रिब के चेहरे पर यारो अपने ख़ून की लाली हैलेकिन अब उस के सूरज की नाव डूबने वाली हैमशरिक़ की तक़दीर में जब तक ग़म के अँधेरे हैंअपनी जंग रहेगीज़ुल्म कहीं भी हो हम उस का सर ख़म करते जाएँगेमहलों में अब अपने लहू के दिए न जलने पाएँगेकुटियाओं से जब तक सुब्हों ने मुँह फेरे हैंअपनी जंग रहेगीजान लिया ऐ अहल-ए-करम तुम टोली हो अय्यारों कीदस्त-ए-निगर क्यूँ बन के रहे ये बस्ती है ख़ुद्दारों कीडूबे हुए दुख-दर्द में जब तक साँझ सवेरे हैंअपनी जंग रहेगी
मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ कोअभी तक दिल में तेरे इश्क़ की क़िंदील रौशन हैतिरे जल्वों से बज़्म-ए-ज़िंदगी जन्नत-ब-दामन हैमिरी रूह अब भी तन्हाई में तुझ को याद करती हैहर इक तार-ए-नफ़स में आरज़ू बेदार है अब भीहर इक बे-रंग साअत मुंतज़िर है तेरी आमद कीनिगाहें बिछ रही हैं रास्ता ज़र-कार है अब भीमगर जान-ए-हज़ीं सदमे सहेगी आख़िरश कब तकतिरी बे-मेहरियों पर जान देगी आख़िरश कब तकतिरी आवाज़ में सोई हुई शीरीनियाँ आख़िरमिरे दिल की फ़सुर्दा ख़ल्वतों में जा न पाएँगीये अश्कों की फ़रावानी से धुँदलाई हुई आँखेंतिरी रानाइयों की तमकनत को भूल जाएँगीपुकारेंगे तुझे तो लब कोई लज़्ज़त न पाएँगेगुलू में तेरी उल्फ़त के तराने सूख जाएँगेमबादा याद-हा-ए-अहद-ए-माज़ी महव हो जाएँये पारीना फ़साने मौज-हा-ए-ग़म में खो जाएँमिरे दिल की तहों से तेरी सूरत धुल के बह जाएहरीम-ए-इश्क़ की शम-ए-दरख़्शाँ बुझ के रह जाएमबादा अजनबी दुनिया की ज़ुल्मत घेर ले तुझ कोमिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को
इस सूरत सेअर्ज़ सुनातेदर्द बतातेनय्या खेतेमिन्नत करतेरस्ता तकतेकितनी सदियाँ बीत गई हैंअब जा कर ये भेद खुला हैजिस को तुम ने अर्ज़ गुज़ारीजो था हाथ पकड़ने वालाजिस जा लागी नाव तुम्हारीजिस से दुख का दारू माँगातोरे मंदिर में जो नहीं आयावो तो तुम्हीं थेवो तो तुम्हीं थे
किस को समझाएँ उसे खोदें तो फिर पाएँगे क्याहम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खाएँगे क्याक़ैद भी कर दें तो हम को राह पर लाएँगे क्याये जुनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छुट जाएँगे क्या
दुआ दुआ वो चेहराहया हया वो आँखेंसबा सबा वो ज़ुल्फ़ेंचले लहू गर्दिश मेंरहे आँख में दिल मेंबसे मिरे ख़्वाबों मेंजले अकेले-पन मेंमिले हर इक महफ़िल मेंदुआ दुआ वो चेहराकभी किसी चिलमन के पीछेकभी दरख़्त के नीचेकभी वो हाथ पकड़तेकभी हवा से डरतेकभी वो बारिश अंदरकभी वो मौज समुंदरकभी वो सूरज ढलतेकभी वो चाँद निकलतेकभी ख़याल की रौ मेंकभी चराग़ की लौ मेंदुआ दुआ वो चेहराकभी बाल सुखाए आँगन मेंकभी माँग निकाले दर्पन मेंकभी चले पवन के पाँव मेंकभी हँसे धूप में छाँव मेंकभी पागल पागल नैनों मेंकभी छागल छागल सीनों मेंकभी फूलों फूल वो थाली मेंकभी दियों भरी दीवाली मेंकभी सजा हुआ आईने मेंकभी दुआ बना वो ज़ीने मेंकभी अपने-आप से जंगों मेंकभी जीवन मौज-तरंगों मेंकभी नग़्मा नूर-फ़ज़ाओं मेंकभी मौला हुज़ूर दुआओं मेंकभी रुके हुए किसी लम्हे मेंकभी दुखे हुए किसी चेहरे मेंवही चेहरा बोलता रहता हूँवही आँखें सोचता रहता हूँवही ज़ुल्फ़ें देखता रहता हूँदुआ दुआ वो चेहराहया हया वो आँखेंसबा सबा वो ज़ुल्फ़ें
ग़म-ए-दौराँ से जब भी फ़ुर्सत-ए-यक-लम्हा पाएँगेतिरी यादों में खो जाएँगे ख़ुद को भूल जाएँगे
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता थाऔर उस ज़ीने से ख़्वाबों काजो लहराता हुआ जाता था छत तकवो छतजहाँ से आसमाँ नज़दीक थाजहाँ आराम फ़रमाती थीं आँखेंवो आँखें जिन में सपने थेवो सपने जिन में दुनिया थीवो दुनिया जिस में सब कुछ थावही छतजहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थीपतंगों की सजावट थीफ़लक की झिलमिलाहट थीमगर अफ़सोसवो चिड़िया जो सवेरे घर में सबसे पहले उठती थीकिसे मा'लूम था इक दिन वो ज़ेर-ए-दाम आएगीपतंग-ए-काग़ज़ी जो आसमाँ छूने ही वाली थीकिसे मा'लूम था वो लौट कर नाकाम आएगीफ़लक जिस पर तमन्नाओं के कितने चाँद रौशन थेकिसे मा'लूम था उस पर अमावस की भी कोई शाम आएगीवो छत जो घर का सबसे पुर-सुकूँ और प्यारा हिस्सा थीकिसे मा'लूम था वो ख़ुद-कुशी के काम आएगी
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